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वेदना की गहराइयों में भी

— ओत्तो रिने कास्तिय्यो

रात की पेंदी पर
गिरते हैं कदम और वापस उठते हैं.

उन्हें घेरती हैं छायाएं,
गलियां, पियक्कड़, इमारतें,
कोई एक जो भाग रहा है खुद से,
एक टूटी हुई बोतल, रक्तरंजित.
किसी कोने में फड़फडाता एक रंडुआ कागज
एक मुक्तचिन्तक घास पर मूतता हुआ,
ओस के नीचे
जहाँ कल सुन्दर पोशाकें पहने हुए बच्चे
खेलेंगे.

कहीं दूर कोई चीखता है, स्याह धातु, जननेंद्रि.
डामर और काले पत्थर, सोती हुई हवा,
अँधेरा, शीत, पुलिस, शीत, और भी अधिक पुलिस.
गलियां, वेश्याएं, पिय्यकड़, इमारतें.
फिर से पुलिस, फौजी, पुलिस फिर से.
आंकड़े कहते हैं: हर 80,000 विधि के अफसरों पर
एक डॉक्टर है ग्वाटेमाला में.

इस तरह समझो मेरे देश का संताप
और मेरी पीड़ा और हर किसी की पीड़ा
कि जब मैं कहता हूँ: रोटी!
वे कहते हैं
चुप रहो!
और जब में कहता हूँ: स्वाधीनता
वे कहते हैं
मरो!

पर मैं न खामोश होता हूँ और न ही मरता हूँ.
मैं जीता हूँ
और लड़ता हूँ, बौखलाहट से भरता हूँ उन्हें
जो राज करते हैं मेरे देश पर.

क्योंकि यदि मैं जिन्दा हूँ
तो लड़ता हूँ
और यदि मैं लड़ता हूँ
तो रंग भरता हूँ नई सुबह में.

अनुवाद: कुलदीप प्रकाश

ओत्तो रेनी कास्तिय्यो की कुछ और कवितायेँ यहाँ देखिये

May 12, 2011 - Posted by | कविता, हिन्दी, poetry

1 Comment »

  1. hi… kuldeep thanks kavita ko translate karne k liye

    Comment by yaduvansh | August 5, 2011


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