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ओत्तो रेनी कास्तिय्यो की कवितायेँ

(प्रस्तुत हैं ग्वाटेमाला के प्रसिद्द कवि और छापामार विद्रोही ओत्तो रेनी कास्तिय्यो की कवितायेँ। अनुवाद कुलदीप प्रकाश का है। यहाँ अभिषेक मिश्रा  के ब्लॉग शहर के पैगम्बरों से कह दो से साभार )

गैर राजनैतिक बुद्धिजीवी

एक दिन
मेरे देश के गैर राजनैतिक बुद्धिजीवियों से
हमारी जनता का सबसे साधारण आदमी
करेगा जबाब-तलब।

उनसे पूछा जायेगा
तब उन्होंने क्या किया
जब उनका देश मर रहा था एक धीमी मौत,
छोटी और अकेली आग की तरह।

कोई नहीं पूछेगा उनसे उनके कपडों के बारे में,
दोपहर के खाने के बाद उनकी लम्बी नींदों के बारे में,
कोई भी नहीं जानना चाहेगा
“अनस्तित्व के विचार” के साथ
उनकी बाँझ मुठभेडों के बारे में
उनकी श्रेष्ठ वित्तीय शिक्षा की
कोई भी फ़िक्र नहीं करेगा।

उनसे ग्रीक पुराणों के बारे में
सवाल नहीं किये जायेंगे,
न ही उनकी आत्मभर्त्सना के बारे में
जब उनके अन्दर कोई
एक कायर की मौत मरना शुरू करता है।

उनसे कुछ नहीं पूछा जायेगा
‘सम्पूर्ण जीवन’ की छाया में पैदा हुई
उनकी अतार्किक बहानेबाजियों के बारे में।

उस दिन
आम लोग आयेंगे
वे जिनकी कोई जगह नहीं है
गैर राजनैतिक बुद्धिजीविओं की
किताबों और कविताओं में
लेकिन जिन्होंने
रोज पैदा किये
उनके लिए पावरोटी और दूध
पराठें और अंडे
जिन्होंने उनकी कारें चलाईं,
जिन्होंने उनके कुत्तों और बगीचों की देखभाल की
और उनके लिए हर काम किया
और वे पूछेंगे :
क्या किया तुमने
जब गरीब यातनाएं सह रहे थे
जब उनके भीतर की कोमलता और जीवन धुंआ हो कर बाहर निकल रहा था ?

मेरे प्यारे देश के
गैर राजनैतिक बुद्धिजीविओं
तुम से फूटेगा नहीं कोई जवाब,
एक खामोशी का गिद्ध
तुम्हारे साहस को नोच खायेगा।
तुम्हारे खुद का कष्ट
तुम्हारी आत्मा को जकड़ लेगा।
और शर्म से तुम गूंगे हो जाओगे।


भूख और बन्दूक

तुम्हारे पास बन्दूक है
और मैं भूखा हूँ

तुम्हारे पास बन्दूक है
क्योंकि मैं भूखा हूँ

तुम्हारे पास बन्दूक है
इसलिए मैं भूखा हूँ

तुम एक बन्दूक रख सकते हो
तुम्हारे पास एक हज़ार गोलियां हो सकती हैं
और एक हज़ार और हो सकती हैं
तुम उन सब को मेरे नाचीज शरीर पर आजमा सकते हो
तुम मुझे एक, दो, तीन, दो हज़ार, सात हज़ार, बार मार सकते हो
लेकिन अंततः
मैं हमेशा तुमसे ज्यादा हथियारबंद रहूँगा

यदि तुम्हारे पास एक बन्दूक है
और मेरे पास
केवल भूख।

संतुष्टि

जो जीवन भर लड़े हैं
उनके लिए सबसे खुबसूरत चीज है
अंत पर पहुँच कर कहना
हमने भरोसा किया जनता और जीवन पर
और जीवन और जनता ने
हमें कभी नीचा नहीं दिखाया।

केवल इसी तरह से पुरुष बनते हैं पुरुष,
औरते बनती हैं औरतें,
लड़ते हुए रात और दिन
जनता और जीवन के लिए।

और जब ये जिंदगियां आती हैं ख़त्म होने को
लोग खोल देते हैं अपनी सबसे गहरी नदियों को
और समां जाते है उन पानियों में सदा के लिए।
और बन जाते हैं दूरस्थ आग की तरह, जीवित
दूसरों के लिए मिसाल बनते हुए।

जो जीवन भर लड़े हैं
उनके लिए सबसे खुबसूरत चीज है
अंत पर पहुँच कर कहना
हमने भरोसा किया जनता और जीवन पर
और जीवन और जनता ने
हमें कभी नीचा नहीं दिखाया।

July 15, 2009 - Posted by | कविता, हिन्दी

2 Comments »

  1. its my first visit and its really good…here my small poem…
    mai pagal hon so bhuka hon
    ya mai bhuka hon so pagal hon
    cheeno ya jutha khaon
    bol pet mere mai kaise khaon
    marta hon mai bhi,jalta hai tu bhi
    bol teri jalan kaise mitaon
    bol pet mere,mai kaise khaon
    hathiyar uthaon or duniya badlon
    ya hathiyar dal khud badal jaon
    bol pet mere mai kaise khaon
    hathiyar uthaon to aatanki kahlaon
    hathiyar dalon to bhuko mar jaon
    bol pet mere, mai kaise khaon
    mai pagal hon so bhuka hon
    ya mai bhuka hon so pagal hon…

    afaque

    Comment by afaque | October 29, 2010

  2. Dear Moderator,
    Kindly keep on posting the matters on blog. It is an important asset of us.

    Comment by nandan | October 29, 2010


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