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कोयले की काली दुनिया

शुभ्रांशु चौधरी

“कोयले की काली दुनिया” एक टीवी फिल्म का नाम है जिसे दिल्ली की एक प्रमुख टीवी कम्पनी में काम करने वाले एक पत्रकार ने बनाया है । 15 मिनट की यह फिल्म मुख्यत: छत्तीसगढ के कोरबा स्थित गेवरा-दीपका माइंस के बारे में है ।

शूटिंग पूरी होने के बाद एकदिन अचानक टीवी स्टेशन ने फिल्म को न दिखाने का फैसला लिया । नाराज़ होकर उस पत्रकार ने टीवी कंपनी की नौकरी छोड दी और उस फिल्म की सीडी बनाकर काफी लोगों को बांटी । एक कॉपी मुझे भी मिली जिसे आप छत्तीसगढ की जन वेबसाईट “www.cgnet.in” पर देख सकते हैं ।
छत्तीसगढ के बिलासपुर में मुख्यालय वाला एसईसीएल देश की सबसे बडी कोयला कम्पनी है और गेवरा- दीपका न सिर्फ देश का बल्कि एशिया की सबसे बडी ओपेंनकास्ट माइन है । प्रदेश को कोयले से खासी रॉयल्टी की प्राप्ति होती है और उसमें कोरबा और एसईसीएल का नाम सबसे ऊपर है ।

क़ोयले की काली दुनिया फिल्म में गेवरा-दीपका के बारे में कई गंभीर सवाल उठाए गए है । इसमें दिखाया गया है कि कोयला मंत्रालय ने गेवरा-दीपका माइंस के लिये कोयले की लोडिंग-अनलोडिंग का ठेका पूर्व सैनिकों द्वारा संचालित कम्पनियों को देने का फैसला किया था । इन कम्पनियों को अन्य सामन्य कम्पनियों की तुलना में खासी रियायत दी जाती है । फिल्म बताती है कि इस ठेके के लिये एसईसीएल को कोई भी छत्तीसगढी पूर्व सैनिक नहीं मिला । लगभग सारे के सारे ठेके दिल्ली एवं हरियाणा के पूर्व सैनिकों को दिये गये हैं ।

यहां तक तो बात ठीक है आखिर दिल्ली और हरियाणा भी इस देश के हिस्से हैं । पर इसके बाद यह फिल्म बताती है कि जिन कम्पनियों को ये ठेके मिले हैं उनमें से काफी ने अपने रजिस्टर्ड दफ्तर के लिये जो पते दिये हैं वे फर्ज़ी हैं । वहां या तो उन कम्पनियों से सम्बन्धित कोई नहीं रहता या फिर वह पता ही गलत है ।
फिल्म का कैमरा एक के बाद एक उन पतों पर जाता है और दरवाज़ा खोलने वाले आश्चर्यचकित लोग कैमरे पर बताते हैं क्या कम्पनी, कौन सा कोयला, हमने तो कभी सुना ही नहीं । कुछ पते के बारे में लोग बताते हैं “यह पता गलत है इस नाम का कोई ब्लॉक हमारी कॉलोनी में नहीं है” ।

इसके बाद यह फिल्म दिखाती है कि विभिन्न नाम और पते से चल रही इन तमाम कम्पनियों के चार्ट्र्ड अकाउंटेंट एक ही व्यक्ति हैं और काफी कम्पनियों की फाएनेंसिंग एक ही कम्पनी से हुई है जिसका मालिक भी मूल कम्पनी के मालिक के परिवार का है।

दर असल फिल्म इस ओर इशारा करती है कि विभिन्न नाम एवं पते से एक ही व्यक्ति ने सारे के सारे ठेके के लिये हैं । बताया गया कि यह व्यक्ति भाजपा के एक पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं पूर्व मुख्यमंत्री का रिश्तेदार है और यह परिवार छत्तीसगढ में एक प्रमुख दैनिक अखबार का मालिक भी है ।

फिल्म में इसके बाद बताया गया है कि न सिर्फ लोडिंग-अनलोडिंग बल्कि कोयले के उत्पादन से जुडे तमाम काम जैसे कोयले का वजन करना, सुरक्षा कम्पनी इत्यादि सभी काम पर इस एक की व्यक्ति का कब्ज़ा हो गया है ।

इसके बाद यह फिल्म एसईसीएल के प्रमुख श्री बी के सिन्हा से बात करती है और इसमें श्री सिन्हा एक चौंकाने वाली बात करते हैं । श्री सिन्हा कहते हैं “ अगर मैं इनके घोटाले को पकडने की कोशिश करूंगा तो ये लोग मुझे ही लाश बनाकर जिंदा गाड देंगे” । जी हां श्री सिन्हा के इस वक्तव्य को मैंने कई बार सुना और यह इंटरव्यू छुपे हुये कैमरे से नहीं बल्कि एक सामान्य कैमरे से लिया गया है ।

इसके बाद फिल्म कांग्रेस के धनबाद से सांसद चंद्रशेखर दुबे से बात करती है । श्री दुबे कहते हैं “ कोरबा में कोल माफिया का राज हो गया है” ।
हमने धनबाद के कोल माफिया राज के बारे में तो खूब सुना है । आपने भी धनबाद के प्रसिद्ध कोल माफिया सूरजभान सिंह पर लिखी गई कहानियां पढी होंगी । चंद्रशेखर दुबे धनबाद से ही सांसद हैं तो उन्हें इस बारे में मालूम होना चाहिये । मैंने श्री दुबे से मिलने का फैसला किया ।

श्री दुबे ने बताया कि वे हाल ही में सांसदों के एक दल के साथ इस मामले की छानबीन करने के लिये कोरबा गये थे । वहां पर सांसदों की इस टीम पर हमला भी हुआ । श्री दुबे ने कोयला मंत्रालय द्वारा बनाई सांसदों की इस टीम पर हुए हमले के चित्र और उनकी रिपोर्ट मुझे दिखाई ।

रिपोर्ट कहती है “इस समिति को ऐसा लगता है कि गेवरा-दीपका में एसईसीएल ने ब्लास्टिंग करने और धन बांटने के अलावा सारा काम कुछ कम्पनियों के हाथ छोड रखा है और इन तमाम कम्पनियों की चाबी दरअसल चन्द लोगों के हाथ में नज़र आती है और ऐसा लगता है कि यहां हो रहे घोटाले से कई हज़ार करोड का नुकसान देश को हुआ है” ।

श्री दुबे ने कहा कि इस रिपोर्ट को न प्रकाशित करने के लिये मेरे पास कई फोन आए जिनमें छत्तीसगढ के कई बडे नेता शामिल हैं । उन्होंने कई नेताओं के नाम भी मुझे बताए । यहां तक कि रामदेव बाबा ने भी मुझे 4 बार टेलीफोन किया कि मैं इस मामले को छोड दूं ।

इस समिति में 6 सदस्य थे पर छत्तीसगढ के एक सांसद ने समिति की रिपोर्ट पर दस्तखत नहीं किए और भाजपा के एक सांसद ने दस्तखत करने के कुछ दिन बाद अपना नाम वापस ले लिया ।

इस फिल्म में पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी को यह कहते हुए दिखाया गया है कि इस मामले की सीबीआई से जांच कराई जानी चाहिये और सीबीआई ने एक बार नहीं बल्कि तीन बार इसकी जांच की है और इसमें कोई अनियमितता नहीं पाई ।

फिल्म में एक रोचक कहानी का जिक्र है जिसमें एक पूर्व सैनिक कम्पनी ने कोरबा से रिजेक्ट कोयला ट्रक में लोड किया पर जब तक यह कोयला हिण्डालको की फैक्टरी में पहुंचा तब वह सर्वोत्तम श्रेणी का कोयला बन गया था । यह अलग बात है कि इस कम्पनी को रिजेक्ट बेचने की कोई अनुमति नहीं है ।

श्री दुबे कहते हैं “यह आश्चर्य की बात है कि टीवी के पत्रकार यह सब पता कर सकते हैं कि कम्पनियों द्वारा बताये पते फर्ज़ी हैं, लगभग सारे कम्पनियों के फायनेंसर एक ही हैं और वे और कम्पनियों को चोरी का कोयला बेच रहे हैं पर देश की सर्वोच्च जांच संस्था इस बारे में कुछ पता नहीं लगा सकती । दरअसल ये जांच उस समय हुई जब केंद्र में हमारी सरकार नहीं थी अब हम फिर से सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं” ।
एसईसीएल की आंतरिक जांच रिपोर्टों में इन अनियमितताओं के प्रति कडा रुख अपनाने की सलाह है जिसकी प्रति इस लेखक के पास उपलब्ध है ।

श्री दुबे ने बताया कि जब उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय में इस बारे में शिकायत की तो उसके कुछ दिन बाद प्रधानमंत्री कार्यालय में उनके नाम से एक पत्र पहुंच गया जिसमें उनकी शिकायत वापस लेने की अपील की गयी थी । श्री दुबे कहते हैं “जरा सोचिये जो लोग प्रधानमंत्री के दफ्तर में मेरे नाम का फर्ज़ी पत्र भेज सकते हैं जिसमें मेरा लेटरपैड हो और मेरा दस्तखत हो तो ऐसे लोग क्या नहीं कर सकते” ।

“कोरबा में आजकल इस कम्पनी का राज चलता है । एसईसीएल के तमाम अधिकारी रिटायर होने के बाद इस कम्पनी में शामिल हो जाते हैं” ।

“मैंने रक्षा मंत्री श्री एंटनी से बात की है और उन्होंने मुझे इस पूरे पूर्व सैनिक कम्पनियों के घपले की जांच करवाने का वादा किया है” । मैंने भी श्री एंटनी के दफ्तर से पता लगाने की कोशिश की तो मुझे बताया गया कि श्री एंटनी ने जांच के आदेश दे दिये हैं ।

चन्द्रशेखर दुबे के पहले धनबाद से एक सांसद हुआ करते थे ए के रॉय । पुराने ट्रेड यूनियन नेता श्री राय ने 80 के दशक में संसद में एक विख्यात टिप्प्णी की थी । उन्होंने धनबाद में माफिया राज पर हो रही बहस के दौरान कहा था “हमारे धनबाद में आजकल A+B+C = D हो गया है” । जब बात किसी की समझ में नहीं आई तो श्री राय ने बताया था “आरा+बलिया+छपरा = धनबाद । धनबाद में आजकल आरा, बलिया और छपरा के बाहुबलियों का ही राज है” ।इस फिल्म को देखने के बाद अब मुझे समझ में आ रहा है कि मेरी पिछली यात्रा में कोरबा में लोग यह क्यों बता रहे थे कि कोरबा अब हरियाणा बन गया है !

मुझे तो लगता था कि बैलाडीला के धुर नक्सली इलाके में बैठे एनएमडीसी के प्रमुख को हर वक्त जान का खतरा लगा रहता होगा । पर बिलासपुर उच्च न्यायालय से कुछ किलोमीटर की दूरी पर बैठकर उस सरकारी कम्पनी का प्रमुख जो प्रदेश को सबसे अधिक रॉयल्टी देता है अगर यह कहता है कि यदि वह भ्रष्टाचार की जांच करने जाएगा तो उसे ही ज़िंदा गाड दिया जाएगा, शायद यह इस प्रदेश के बारे में कुछ कहता है और इस देश की पत्रकारिता के बारे में भी जहां इस तरह की खबरें खबर नहीं बनती ।

क्या कोयले की काली कहानी सिर्फ कोरबा के कोयले से जुडे कालिख की कहानी है या इस कहानी के तार रायपुर और दिल्ली की कालिख से भी जुडे हैं ?

smitashu@gmail.com

February 17, 2008 - Posted by | articles

1 Comment »

  1. लेख में निम्न पंक्तियाँ ध्यान देने लायक है —
    “श्री दुबे ने कहा कि इस रिपोर्ट को न प्रकाशित करने के लिये मेरे पास कई फोन आए जिनमें छत्तीसगढ के कई बडे नेता शामिल हैं । उन्होंने कई नेताओं के नाम भी मुझे बताए । यहां तक कि रामदेव बाबा ने भी मुझे 4 बार टेलीफोन किया कि मैं इस मामले को छोड दूं ।”
    बाबा रामदेव का नाम इससे पहले भी भाजपा से सांठगाँठ के मामले में कई बार आ चुका है.
    रामसेतु पर रामदेव के बवाल व वामपंथियों पर उनके विषवमन का अर्थ अब समझा जा सकता है.

    Comment by प्रमोद | February 17, 2008


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