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बिलकीस को सलाम

बिलकीस बानो के मामले में तेरह लोगों को सज़ा सुनाई गई है पर क्या सिर्फ वे ही गुनाहगार थे ? बिलकीस के अलावा बेस्ट बेकरी,गुलबर्गा सोसायटी,नरोदा पटिया का इन्साफ होना बाक़ी है क्या इनके खून के निशान २००२ से और पीछे नहीं जाते ? क्या उस व्यक्ति को कभी अदालतें हाजिर होने का हुक्म सुनायेंगी जिसने गुजरात से ही वह रथ निकाला था जिससे पूरे देश में मुसलमानों के खिलाफ घृणा और हिंसा क प्रचार किया गया था और जो इस देश का गृहमंत्री रह चुका है और प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब देख रहा है ? या उस व्यक्ति को जो भारत रत्न होने की इच्छा रखता है, लेकिन जिसने गुजरात में बिलकीस पर हमले का औचित्य यह कह कर खोजने की कोशिश की थी कि गोधरा में आग पहले किसने लगाई या उसे जिसने यह कहा था कि बिलकीस जैसे बलात्कार और पेट चीर कर भ्रूण जलाना एक आम घटना है जिसे जरुरत से ज्यादा गंभीरता से लेने कि आवश्यकता नहीं ? या उस अखबार को जिसने इस घटना के दो रोज़ पहले यह खबर छापी, जो पूरी तरह मनगढ़ंत थी कि गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस पर हमले में दो लड़कियों को अगवा करके उनके साथ बुरी तरह बलात्कार करके, उनकी छाती काट के लाशों को कालोल के एक तालाब में फेंक दिया गया है ? या उस संगठन को जो कई सालों से पर्चे छाप कर बाँट रहा था कि हर साल गुजरात में दस हज़ार हिंदू लड़कियों का बलात्कार किया जाता है मुसलमान मर्द हिन्दू लड़कियों को अगवा कर उन्हें खराब करते हैं

क्या बिलकिस का बलात्कार एक क्षणिक आवेश में भीड़ ने किया या यह बरसों से नफरत के सुसंगठित प्रचार कि परिणति थी जिसकी ओर से राज्य और न्याय प्रणाली ने आँखे मूँद रखे थी ? क्या किसी सभ्य समाज में इस तरह के घृणा के प्रचार कि इजाज़त दी जा सकती है ? लेकिन इस समाज को अपनी नागरिक नैतिकता के बारे में अभी बहुत सोचने कि जरूरत है,जिसका सबसे बड़ा और सदी का महान अभिनेता मुम्बई के उस मुजरिम के साथ तस्वीरें खिचवानें में गौरव का अनुभव करता है जो रोज़ रोज़ मुसलमानों के खिलाफ नफरत का प्रचार करता रहा है और जिसने बाबरी मस्जिद के गिरा दिए जाने पर ख़ुशी ज़ाहिर की थी

January 30, 2008 - Posted by | articles, हिन्दी

1 Comment »

  1. दरअसल! न्यायलय ने बिलकीस बानो के मामले में तेरह लोगों को सजा सुनाकर जनता में अपने न्यायप्रिय होने का “भ्रम” पैदा करना चाहती है, साथ ही वह आम जनता का ध्यान गुजरात में घटी अन्य घटनाओं और उसमें शामिल बड़ी हस्तियों व संगठनों से हटाना चाहती है.
    जब किसी घटना से आम जनता का “राज्य” पर से विश्वाश उठने लगता है तो इस विश्वाश को कायम रखने के लिए न्यायलय न्यायप्रियता का मुखौटा ओढ़ कर, घटना में शामिल सबसे निचली पायदान पर खड़े कुछ व्यक्तियों को दोषी बता कर अपने न्यायप्रिय होने का नगाड़ा पीटता है, ताकि इस शोर में व्यवस्था पर उठने वालों सवालों को दबाया जा सके.
    न्यायालय का यह नगाड़ा, बिलकीस बानो के मामले में आज फ़िर से बज रहा है. ताकि इस शोर में गुलबर्गा सोसाइटी की चीख या नारोदापाटिया में त्रिशूल की नोंक पर उछाले गए उस अजन्मे बच्चे की तड़प या बेस्टबेकरी या 25-30 की संख्या में हिंसक उन्मादी भीड़ के बीच उस नाबालिग़ बच्ची की चीख, को दबाया जा सके. और साथ ही इस नरसंघार में शामिल स्वयं – सेवकों, तथाकथित वरिष्ट व्यक्तियों व संगठनों के नामों भी दबाया जा सके.
    बिलकीस मामले पर दोनों ही लेख काफ़ी अच्छे हैं. “बिलकीस को सलाम” वाले लेख का तेवर अच्छा लगा. साम्प्रदायिकता के सवाल पर, ख़ास कर गुजरात के सवाल पर इसी तेवर में लेख लिखे जाने की जरूरत है. यह बहुत अच्छी बात है कि आप हम हिन्दी पाठकों का ख़याल रख रहें हैं इसीलिए हिन्दी के कुछ लेख ब्लॉग पर आ जाते हैं, लेकिन और लेखों का अनुवाद करने या लिखे जाने कि जरूरत है,ताकि यह ब्लॉग हिन्दी पाठकों कि जरूरत बन सके…………. एक छोटी सी प्रूफ़ की गलती है “जिसकी और से राज्य…..” यहाँ “और” के बजाय “ओर” होना चाहिए था.

    Comment by सुनील | February 5, 2008


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