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Archive for the 'हिन्दी' Category


नदिया बिक गई पानी के मोल

Posted by parisar on March 5, 2008

आलोक प्रकाश पुतुल

कहते हैं सूरज की रोशनी, नदियों का पानी और हवा पर सबका हक़ है। लेकिन छत्तीसगढ़ में ऐसा नहीं है. छत्तीसगढ़ की कई नदियों पर निजी कंपनियों का कब्जा है. दुनिया में सबसे पहले नदियों के निजीकरण का जो सिलसिला छत्तीसगढ़ में शुरु हुआ, वह थमने का नाम नहीं ले रहा. छत्तीसगढ़ की इन नदियों में आम जनता नहा नहीं सकती, पीने का पानी नहीं ले सकती, मछली नहीं मार सकती. सेंटर फॉर साइंस एंड इनवारनमेंट की मीडिया फेलोशीप के तहत पत्रकार आलोक प्रकाश पुतुल द्वारा किए गए अध्ययन का यह हिस्सा आंख खोल देने वाला है. यहाँ रेयाज के ब्लॉग हाशिया से साभार प्रस्तुत

पानी का मोल कितना होता है ?

इस सवाल का जवाब शायद छत्तीसगढ़ में रायगढ़ के बोंदा टिकरा गांव में रहने वाले गोपीनाथ सौंरा और कृष्ण कुमार से बेहतर कोई नहीं समझ सकता.

26 जनवरी, 1998 से पहले गोपीनाथ सौंरा और कृष्ण कुमार को भी यह बात कहां मालूम थी.

तब छत्तीसगढ़ नहीं बना था और रायगढ़ मध्यप्रदेश का हिस्सा था. मध्यप्रदेश के इसी रायगढ़ में जब जिंदल स्टील्स ने अपनी फैक्टरी के पानी के लिए इस जिले में बहने वाली केलो नदी से पानी लेना शुरु किया तो गाँव के गाँव सूखने लगे. तालाबों का पानी कम होने लगा. जलस्तर तेजी से गिरने लगा. नदी का पानी जिंदल की फैक्ट्रीयों में जाकर खत्म होने लगा. लोगों के हलक सूखने लगे.

फिर शुरु हुई पानी को लेकर गाँव और फैक्ट्री की अंतहीन लड़ाई. गाँव के आदिवासी हवा, पानी के नैसर्गिक आपूर्ति को निजी मिल्कियत बनाने और उस पर कब्जा जमाने वाली जिंदल स्टील्स के खिलाफ उठ खड़े हुए. गाँववालों ने पानी पर गाँव का हक बताते हुए धरना शुरु किया. रायगढ़ से लेकर भोपाल तक सरकार से गुहार लगाई, चिठ्ठियाँ लिखीं, प्रर्दशन किए. लेकिन ये सब कुछ बेकार गया. अंततः आदिवासियों ने अपने पानी पर अपना हक के लिए आमरण अनशन शुरु किया.

बोंदा टिकरा के गोपीनाथ सौंरा कहते हैं - “मेरी पत्नी सत्यभामा ने जब भूख हड़ताल शुरु की तो मुझे उम्मीद थी कि शासन मामले की गंभीरता समझेगा और केलो नदी से जिंदल को पानी देने का निर्णय वापस लिया जाएगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ “

भूख हड़ताल पर बैठी सत्यभामा सौंरा की आवाज़ अनसुनी रह गई. लगातार सात दिनों से अन्न-जल त्याग देने के कारण सत्यभामा सौंरा की हालत बिगड़ती चली गई और 26 जनवरी 1998 को जब सारा देश लोकतांत्रिक भारत का 48वां गणतंत्र दिवस मना रहा था, पानी की इस लड़ाई में सत्यभामा की भूख से मौत हो गई.

सत्यभामा के बेटे कृष्ण कुमार बताते हैं- “इस मामले में मेरी मां की मौत के ज़िम्मेवार जिंदल और प्रशासन के लोगों पर मुकदमा चलना था लेकिन सरकार ने उलटे केलो नदी को निजी हाथ में सौंपने के खिलाफ मेरी मां के साथ आंदोलन कर रहे लोगों को ही जेल में डाल दिया. ”

इस बात को लगभग दस साल होने को आए.

इन दस सालों में सैकड़ों छोटी-बड़ी फैक्ट्रियाँ रायगढ़ की छाती पर उग आईं हैं. पूरा इलाका काले धुएं और धूल का पर्याय बन गया है. सितारा होटलें रायगढ़ में खिलखिला रही हैं. आदिवासियों के विकास के नाम पर अलग छत्तीसगढ़ राज्य भी बन गया है. कुल मिला कर ये कि आज रायगढ़ और उसका इलाका पूरी तरह बदल गया है.
नहीं बदली है तो बस नदी की कहानी……… Read the rest of this entry »

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आखिर मेरा कसूर ही क्या है?

Posted by parisar on February 14, 2008

तसलीमा नसरीन

मैंने ऐसा कुछ भी नहीं किया जो गलत हो. इसके बावजूद चार महीने तक मुझे कोलकाता में नज़रबंद रखा गया. मुझे घर से बाहर जाने की इजाज़त नहीं थी. सरकार बार-बार मुझसे देश या फिर राज्य छोड़ने के लिए कहती रही, कहती रही कि यहां से कहीं और चली जाओ. मगर मैंने कोलकाता छोड़ने से इनकार कर दिया. उस घर को छोड़ने से इनकार कर दिया जिसे मैंने बड़ी मेहनत से बसाया था. मैंने इनकार किया क्योंकि मुझे इसे छोड़ने की कोई वजह नजर नहीं आयी. मैं ये यकीन ही नहीं कर पा रही थी कि मेरी वजह से शहर में दंगे भी हो सकते हैं. मुझे इस बात पर विश्वास ही नहीं होता था कि मेरी वजह से शहर में लोगों की जानें जा सकती हैं. मैं इस शहर में पूरी तरह से सुरक्षित महसूस करती हूं. कोलकाता की सड़कों पर मैं बिना किसी डर के घूमी हूं, एक भी सुरक्षाकर्मी के बगैर. एक भी कट्टरपंथी से मेरा सामना नहीं हुआ. जो भी मेरे नज़दीक आया उसने ऐसा सिर्फ इसलिए किया क्योंकि वो मुझे चाहता था. एक दो मुस्लिम नेताओं ने जरूर कभी-कभी मेरे खिलाफ बयान दिये क्योंकि इससे उनके कुछ राजनीतिक स्वार्थ पूरे होते थे. इसलिए नहीं कि इसका उनकी धार्मिक भावनाओं से कुछ लेना-देना था.

मुझे पूरा यकीन है कि 21 नवंबर को हुई हिंसा का मेरे साहित्य से कोई लेना-देना नहीं था. अगर ऐसा होता तो ‘द्विखंडिता’ से विवादित अंशों को हटाने के बाद मेरा कोलकाता लौट पाना मुमकिन हो जाता. मैं जानती हूं कि 21 नवंबर को जिन लोगों ने सड़कों पर उत्पात मचाया वो मेरे साहित्य के बारे में पूरी तरह से अनजान थे. जिस नफ़रत और नाराज़गी का प्रदर्शन करते हुए उन्होंने पुलिस पर पथराव किया वो किसी दूसरी वजह से उपजी थी. वो शहर में मेरे रहने को लेकर नाराज़ नहीं थे.

मुझे राज्य से बाहर भेजने की साज़िश तो काफी लंबे समय से चल रही थी. मगर 22 नवंबर को किसी तरह से इसकी परिणति कर दी गई. मगर मेरा कसूर क्या था? मैंने क्या अपराध किया था कि कोलकाता में मुझे अपने ही घर में कैद कर दिया गया. किस गुनाह के लिए मुझे कोलकाता से निकाला गया? क्या कसूर है मेरा जिसके लिए मुझे दिल्ली में इस अनजान जगह पर एक कमरे में कैद रहने की सज़ा भुगतनी पड़ रही है. ऐसा कमरा जिसके बाहर जाने की मुझे इजाजत नहीं है और न ही इसमें मेरा कोई दोस्त और रिश्तेदार ही मुझसे मिलने आ सकता है. क्यूं मैं अनिश्चितता, निराशा और अकेलेपन का जीवन जीने को मजबूर हूं? मुझे ऐसे माहौल में क्यूं रखा गया है जिसमें मेरा सांस तक लेना दूभर है? मेरा कसूर आखिर है क्या?

केंद्र सरकार कह रही है कि वह मुझे सुरक्षा दे रही है. मगर ये किस तरह की सुरक्षा है? क्या किसी को कैद रखकर भी कोई सुरक्षा दी जाती है? जेल में भी कम से कम मिलने का तो तय समय होता है. यहां तो वो भी नहीं. जेल में रहने वाले अपराधियों को कम से कम ये तो पता होता है कि उनकी रिहाई कब होगी. मुझे तो पता ही नहीं कि कब मुझे इस असहनीय अकेलेपन, अनिश्चितता और जानलेवा खामोशी से आज़ादी मिलेगी.

मुझे कोलकाता छोड़ने को मजबूर किया गया. कहा गया कि कहीं भी जाओ, किसी भी दूसरे देश या राज्य में. इस अनजान जगह पर मुझे कैद रखने का मकसद तो मुझे यही लग रहा है कि मैं परेशान होकर देश छोड़ दूं. अगर ऐसा नहीं है तो मुझे इन ज़ंजीरों से क्यों जकड़ा जा रहा है? मुझे कोलकाता वापस जाने की इजाज़त क्यों नहीं दी जा रही.

क्यों मुझे दिल्ली में भी एक आम जिंदगी जीने से रोका जा रहा है? दिल्ली में तो किसी ने मेरे खिलाफ प्रदर्शन नहीं किए. न ही मुझे जान से मारने की धमकियां मिलीं. बल्कि यहां तो समाज के उदार और जागरूक लोगों ने मेरे समर्थन में आवाज़ भी उठाई. कई बुद्धिजीवी मेरे अभिव्यक्ति के अधिकार का बचाव करते हुए मेरी आज़ादी के लिए अधिकारियों को पत्र लिख रहे हैं. इसके बावजूद मुझे क्यों सलाखों के पीछे ज़िंदगी गुज़ारनी पड़ रही है? जब किसी को धमकी मिलती है तो उसे सुरक्षा इसलिए दी जाती है कि वो अपनी जिंदगी बिना किसी दिक्कत के जी सके. क्या जिस किसी को भी कोई धमकी मिलती है उसे किसी अनजान जगह पर छिपाकर उसकी आवाजाही पर रोक लगा देनी जाहिए?

मैं इस देश को छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगी क्योंकि दुनिया में कोई ऐसा दूसरा देश नहीं है जिसे मैं अपना घर कह सकूं. इस देश में सबसे ज़्यादा खतरा मेरी जान को ही नहीं है. किसी भी देश में कोई भी किसी को धमकी दे सकता है. पिछले 13 सालों में मुझे लगातार एक देश से दूसरे देश में भटकना पड़ा है. ऐसा कट्टपंथियों की धमकियों की वजह से नहीं बल्कि कट्टरपंथियों से अपने स्वार्थ पूरे करने वाली राजनीति की वजह से हुआ है. 1994 में बांग्लादेश से मुझे कट्टरपंथियों ने नहीं बल्कि वहां की सरकार ने निकाला था. आज भी मुझे अपने देश में वापस लौटने की इजाज़त नहीं है. ये आदेश कट्टरपंथियों की ओर से नहीं बल्कि सरकार की तरफ से है. मुझे नहीं लगता कि सरकार मेरी सुरक्षा को लेकर चिंतित है. बांग्लादेश की सरकार को तो सिर्फ अपनी सुरक्षा की ही चिंता है.

मैं ये सोचना ही नहीं चाहती कि भारत दूसरा बांग्लादेश है. मुझे पूरा विश्वास है कि जो थोड़ी-बहुत सुरक्षा की जरूरत है, उसे देकर भारत सरकार मुझे सामान्य जिंदगी देने की इजाज़त दे सकती है. क्या मेरी वजह से दंगे हो जाएंगे, क्या मेरे कारण लोगों की जानें जाएंगी? इस तरह के डर बेबुनियाद हैं. मेरी वजह से कहीं भी कोई दंगा नहीं हुआ. एक लेखक के कारण दंगे नहीं होते. किताब पर प्रतिबंध लगने से पहले और हाईकोर्ट द्वारा प्रतिबंध हटाए जाने के बाद किताब की बिक्री बिना किसी बाधा के हुई है. किसी ने किताब के खिलाफ प्रदर्शन नहीं किया. लेकिन मुझे कई बार दंगों का डर दिखाया गया. मुझे डराकर इस देश से बाहर भेजने की कोशिशें हुईं.

मैं सीधे-सीधे ये कहना चाहती हूं कि मैं दोषी नहीं हूं. मैं ये भी कह चुकी हूं कि मैंने कभी भी किसी की भावनाओं को चोट पहुंचाने के लिए नहीं लिखा. मैंने क्या गलत किया है? मैं हर किसी को, चाहे वो हिंदू हो या मुसलमान या बौद्ध या ईसाई, एक इंसान की तरह देखती हूं. क्या ऐसा करना गलत है? मैं चाहती हूं कि सबके साथ समानता का व्यवहार हो. मैं लगातार मानवता और मानवाधिकारों के समर्थन में लिखती रही हूं. कुछ कट्टरपंथी, रुढ़वादी और संकीर्ण विचारों वाले लोग मुझे बुरा साबित करने पर तुले हैं. लेकिन उनका ऐसा करना मुझे कभी भी इंसानों और इंसानियत के बारे में लिखने से नहीं रोक पाया. उन इंसानों के बारे में जो गरीब हैं और शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित हैं. जिनके अधिकारों पर सिर्फ इसलिए चोट की जाती है क्योंकि वे एक भिन्न आस्था में यकीन रखते हैं. मैं जिस तरह से बांग्लादेश के अल्पसंख्यक हिंदुओं के साथ हूं उसी तरह से भारत के मुसलमानों के भी साथ हूं. मुस्लिम हितों की आड़ में गंदी राजनीति करने वाले कट्टरपंथी, भारत के मुसलमानों के सच्चे प्रतिनिधि नहीं हैं.

क्या ये बताने का समय नहीं आ गया है कि कौन समाज के शत्रु हैं और कौन नहीं? क्या अब भी वक्त नहीं आया है कि इस अनचाही कैद से मुझे आज़ादी मिले? क्या इंसानियत या विचारों की आज़ादी के लिए लिखकर मैंने गलती की है? भारत सरकार मुझे किस जुर्म की सज़ा दे रही है? क्या भारत के लोग इस बात को देखेंगे कि मैं कैसे दर्द, कैसी निराशा और कैसे खालीपन के साथ जी रही हूं? कैसे लोगों की नज़रों से दूर मैं इस अंधेरे में मर रही हूं? कैसे मैं एक देश, घर, दोस्त और समाज के बिना जीने को अभिशप्त हूं? मैंने ऐसा कौन सा गुनाह किया था जो इस धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र में मुझे ये सज़ा मिल रही है?

मेरा राजनीति से कोई लेना-देना नहीं रहा. मैं प्रार्थना करती हूं कि लेखकों पर राजनीति होना बंद हो. एक लेखक को सोचने और लिखने के लिए अनुकूल माहौल मिले, वो बिना किसी डर के लिख सकें. यही मेरी विनम्र प्रार्थना है. मैं बस यही इस देश से मांगना चाहती हूं. हज़ारों सालों से भारत उन सभी लोगों को गले लगाता रहा है जिन्होंने यहां शरण मांगी. मुझे भी इस महान परंपरा पर गर्व है. कुछ ऐसा कीजिये कि इस लेखिका का ये गर्व सारी ज़िंदगी बना रहे.

तसलीमा नसरीन
साभार : तहलका हिन्दी

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सिमोन दा बोउवा

Posted by parisar on February 8, 2008

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यह वर्ष प्रसिद्ध नारीवादी विचारक, लेखक और एक्टिविस्ट सिमोन द बोउवार का जन्मशती वर्ष है।उनका जन्म 9 जनवरी 1908 को पेरिस फ्रांस में हुआ।सिमोन ने दार्शनिक, राजनैतिक और अन्य सामाजिक विषयों पर कई पुस्तकें लिखी जिनमें ‘द सेकेंड सेक्स’ सबसे अधिक चर्चित रही।इस किताब में उन्होने स्त्री शरीर और मन के बारे में पितृसत्ता द्वारा बनाए गए तमाम मिथकों और पारंपरिक विश्वाशों को खुली चुनौती दी। उन्होने सिद्ध किया कि स्त्री पैदा नहीं होती वरन बना दी जाती है।उन्होने बताया की पुरुष प्रधान समाज में स्त्री के चरित्र व प्रकृति को जान बूझ कर एक रहस्य के आवरण में पेश किया जाता है। जिससे समाज में उसकी हैसियत एक ‘अन्या’ की बना दी जाती है। ‘द सेकेंड सेक्स’ का हिन्दी अनुवाद प्रभा खेतान ने ‘स्त्री उपेक्षिता’ शीर्षक से किया है। सिमोन जीवनपर्यंत स्त्रियों की मुक्ति व मानवजाति कि बेहतरी के लिए संघर्षरत रहीं। हम उनके जन्मशताब्दी वर्ष पर सभी छात्रों से उनकी रचनाओं का अध्ययन करने व उन पर विचार गोष्टियाँ आयोजित करने के अलावा विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम लेने का आह्वान करते हैं। हम आने वाली पोस्टों में उनकी इंटरनेट पर उपलब्ध कुछ रचनाओं का लिंक प्रेषित करेंगे।

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बिलकीस को सलाम

Posted by parisar on January 30, 2008

बिलकीस बानो के मामले में तेरह लोगों को सज़ा सुनाई गई है पर क्या सिर्फ वे ही गुनाहगार थे ? बिलकीस के अलावा बेस्ट बेकरी,गुलबर्गा सोसायटी,नरोदा पटिया का इन्साफ होना बाक़ी है क्या इनके खून के निशान २००२ से और पीछे नहीं जाते ? क्या उस व्यक्ति को कभी अदालतें हाजिर होने का हुक्म सुनायेंगी जिसने गुजरात से ही वह रथ निकाला था जिससे पूरे देश में मुसलमानों के खिलाफ घृणा और हिंसा क प्रचार किया गया था और जो इस देश का गृहमंत्री रह चुका है और प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब देख रहा है ? या उस व्यक्ति को जो भारत रत्न होने की इच्छा रखता है, लेकिन जिसने गुजरात में बिलकीस पर हमले का औचित्य यह कह कर खोजने की कोशिश की थी कि गोधरा में आग पहले किसने लगाई या उसे जिसने यह कहा था कि बिलकीस जैसे बलात्कार और पेट चीर कर भ्रूण जलाना एक आम घटना है जिसे जरुरत से ज्यादा गंभीरता से लेने कि आवश्यकता नहीं ? या उस अखबार को जिसने इस घटना के दो रोज़ पहले यह खबर छापी, जो पूरी तरह मनगढ़ंत थी कि गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस पर हमले में दो लड़कियों को अगवा करके उनके साथ बुरी तरह बलात्कार करके, उनकी छाती काट के लाशों को कालोल के एक तालाब में फेंक दिया गया है ? या उस संगठन को जो कई सालों से पर्चे छाप कर बाँट रहा था कि हर साल गुजरात में दस हज़ार हिंदू लड़कियों का बलात्कार किया जाता है मुसलमान मर्द हिन्दू लड़कियों को अगवा कर उन्हें खराब करते हैं

क्या बिलकिस का बलात्कार एक क्षणिक आवेश में भीड़ ने किया या यह बरसों से नफरत के सुसंगठित प्रचार कि परिणति थी जिसकी ओर से राज्य और न्याय प्रणाली ने आँखे मूँद रखे थी ? क्या किसी सभ्य समाज में इस तरह के घृणा के प्रचार कि इजाज़त दी जा सकती है ? लेकिन इस समाज को अपनी नागरिक नैतिकता के बारे में अभी बहुत सोचने कि जरूरत है,जिसका सबसे बड़ा और सदी का महान अभिनेता मुम्बई के उस मुजरिम के साथ तस्वीरें खिचवानें में गौरव का अनुभव करता है जो रोज़ रोज़ मुसलमानों के खिलाफ नफरत का प्रचार करता रहा है और जिसने बाबरी मस्जिद के गिरा दिए जाने पर ख़ुशी ज़ाहिर की थी

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सोया, साम्राज्यवाद और पर्यावरण

Posted by parisar on January 22, 2008

Vandana Shivaसंस्कृति तथा स्वास्थ्य का खतरनाक खेल

वंदना शिवा  

मनुष्यत्व के विकास से लेकर अब तक खाद्यान्न प्रजाति के 80000 से अधिक पौधों का स्वाद हमने चखा है. इनमें से तीन हज़ार से ज्यादा मनुष्य के लगातार इस्तेमाल में आ रहे हैं. बहरहाल, अब हम विश्व की खाद्य जरुरतों को पूरा करने के लिए सिर्फ आठ फसलों पर निर्भर हैं जो कि इस जरुरत का 75 प्रतिशत पूरा करती हैं. लेकिन अब अनुवांशिक अभियांत्रिकी ने उत्पादन को तीन फसलों – सोया, मक्का और राई के बीच समेट दिया है.

मोनोकल्चर हमारी जैव विविधता, हमारे स्वास्थ्य और खाद्यान्न की गुणवत्ता और बहुविविधता को नष्ट कर रहे हैं. मोनोकल्चर को औद्योगिक निर्वासन और कृषि के वैश्वीकरण के जरूरी घटक के जैसा देखा जाता रहा है. उन्हें ज्यादा खाद्यान्न पैदा करने वाला समझा जाता है. हालांकि वे सिर्फ मोनसांटो, कारगिल और ए.डी.एम के लिए ज्यादा प्रभुत्व और मुनाफा कमाने वाले साबित हो रहे हैं. वे जैव विविधता, स्थानीय खाद्यान्न प्रणाली और खाद्यान्न संस्कृति को खत्म करके फर्जी आधिक्य और असल अभाव पैदा कर रहे हैं.
सरसों, नारियल, मूंगफली, तिल, अलसी आदि से बनाए जाने वाले भारतीय देसी खाद्य तेल जिनका प्रसंस्करण विशिष्ट मिलों में किया जाता था, उन्हें “खाद्यान्न सुरक्षा” के बहाने प्रतिबंधित कर दिया गया.

इसके साथ ही साथ सोया तेल पर लगे हुए आयात प्रतिबंध को हटा लिया गया. इसने एक करोड़ किसानों की आजीविका पर संकट पैदा कर दिया. गाँवों में दस लाख तेल मिलें बंद हो गईं. भारतीय बाजारों को सोया सो पाट दिए जाने के कारण स्थानीय खाद्यान्न तेल के दामों में गिरावट आ रही थी. इसके विरोध प्रदर्शन के दौरान बीस से ज्यादा किसानों की जाने गईं. कई लाख टन कृत्रिम रुप से सस्ता जीएमओ सोया तेल भारतीय बाजार में उतार दिया गया. ……. Read the rest of this entry »

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बिलकीस का बलात्कार मोदी ने नहीं किया

Posted by parisar on January 22, 2008

उसके जिस्म से खिलवाड़ हुआ. वह सात माह से थी, जब ख़ुद को हिंदू राष्ट्रभक्त कहने वालों ने उसकी इज्ज़त लूटी. उसके परिवार को लगभग नेस्तनाबूत कर दिया गया. उसकी आंखों के सामने उसके कुनबे के सत्रह लोगों को भीड़ ने मार डाला. मारे जाने वालों में बिलकीस बानो की बच्ची भी थी. सब कुछ वैसा ही हो रहा था जैसा बुरे सपनों में होता है. पुलिस थाने में रिपोर्ट नहीं लिखी गई. मेडिकल जांच में झूठ लिखा गया. अगर सुप्रीम कोर्ट इस मामले को गुजरात से बाहर ले जाने का हुक्म न देता और एक महिला कलेक्टर ने बिलकीस बानो की मदद कर अपनी ड्यूटी ईमानदारी से नहीं निभाई होती, तो बिलकीस बानो की कौन सुनता। क्योंकि गोधरा के गुस्से में सब जायज़ था, हत्या, बलात्कार, बच्चों की हत्या, पुलिस का पक्षपात, डॉक्टरों की डंडी मारती रिपोर्ट. इस बात की सम्भावना काफ़ी थी कि २३ साल की बिलकिस को इस धर्मनिरपेक्ष संविधान वाले देश में इन्साफ मिले ही न. गोधरा के गुस्से में आपा खोना स्वाभाविक सी बात है, ऐसा कुछ तो भाजपा के भारत रत्न अटल बिहारी ने भी संसद में बुदबुदाया था. बिलकीस बानो की किस्मत एक तरफ़ ये सब देखने को मजबूर थी, जो एक आज़ाद हिंदुस्तान और गाँधी की जमीन में एक गर्भवती औरत को कभी नहीं देखना चाहिए था. तारे जमीन पर देखकर दो टसुये बहा कर बाल्टी भर पब्लिसिटी बटोरने वाले अडवानी और उनके पूरे परिवार ने कभी बिलकीस के बारे शायद ही सोचा हो. अगर नरेन्द्र मोदी का फिर मुख्य मंत्री बनना गुजरात का फ़ैसला है तो बिलकीस बनो केस दरअसल उस गुजरात पर फ़ैसला है जो नरेन्द्र मोदी चलाते हैं. राम के नाम पर चीर हरण हो रहा था. और दो महीने बाद ही माँ बनने वाली औरत मुस्लिम हो तो राम (या कृष्ण) क्यों उन्हें आकर बचायेंगे. बिलकीस बानो के साथ जो हुआ, उसमे जाहिर है मोदी का कोई रोल नहीं है. जिन बारह लोगो को इसका दोषी पाया गया उनमे गुजरात के गौरव का नाम नहीं है. साक्षात विकास पुरूष ने थोड़े ही कहा ये बिलकीस बानो है, सात माह से है इसके परिवार को ख़त्म करो, इसकी इज्ज़त लूटो. पुलिस तुम्हारे ख़िलाफ़ कुछ नहीं करेगी. मोदी ने डॉक्टरों से भी नहीं कहा कि बिलकीस बानो की रिपोर्ट सही मत लिखो. गुजरात सरकार के ये कारिंदे पता नहीं किसके इशारे पर ये ड्यूटी बजा रहे थे. और जब गलती नहीं की तो अफ़सोस किस बात का जाहिर करें. मोदी तो बच्चों कि तरह मासूम हैं और लोग देखिये गोधरा के बाद इतने गुस्सा हैं कि वह कहीं तो निकलता ही. भले ही इन लोगों को चुनाव का टिकेट मिला, उन्होंने मोदी को वोट दिया और ख़ुद को सच्चे रामभक्तों कि तरह प्रतिष्ठित किया. हालांकि वे लोग भगवा बनने का दावा करते थे, पर कानूनन मोदी न तो इस घटना के लिए जिम्मेदार हैं और न ही भागीदार. और फिर इस सबके बाद भी देखिये पूरा राज्य चाहता है कि मोदी उनके मुख्यमंत्री रहें. इन लोगों के एयरटेल और हच फ़ोन में रिंग टोन संस्कृत मंत्रों की थी जिसमे प्रचोदायत टाइप के शब्द सुनाई पड़ते हैं. मोदी उनके मुख्य मंत्री हैं और जनहित में अब कोई उनके ख़िलाफ़ कुछ भी बोला जाना गुजरात के ख़िलाफ़ बोला जाना है. इसलिए उसके साथ जो भी हुआ, उसके लिए मोदी के पास न तो कोई शब्द हैं, न तो प्रकट तौर पर कोई भाव. हादसे के छः साल बाद जब शुक्रवार को ये फ़ैसला आया, तो बिलकीस बानो के बचे खुचे घरवाले और रिश्तेदार (करीब साठ लोग) अपने घरों में ताला लगाकर रान्धिकपुर से भाग खड़े हुए कि कहीं फैसले के बाद फिर कोई फजीता न खड़ा हो जाए. ये डर भी मोदी ने थोडी ही पैदा किया है. बिलकीस बानो इस वक्त और गुजरात का सच है. जैसे ये सच है कि नरेन्द्र मोदी को लोग चुन रहे हैं. बड़ी बात ये है कि सारी मुश्किलों के बाद भी बिलकीस ने इन्साफ कि आस न छोड़ी और भले ही जनता की अदालत ने मोदी के पक्ष में फ़ैसला देकर उसकी लाज, उसका स्त्रीत्व, उसके साठ हुए जुल्म और जुर्म, दोनों को छोटा कर दिया हो, कानून की अदालत में ऐसा नहीं हुआ. ये भी सोचने की बात है कि अगर यही मामला गुजरात कि अदालतों में सुना जाता तो क्या तब भी उसका हश्र यही होता. मुम्बई में जब गुरुवार को ये फ़ैसला सुनाया गया, उसके तीन दिन बाद ही यानी कल रविवार को दादर में मोदी की रैली होने वाली है. मैराथन और मुहर्रम के दिन. मुम्बई में भाजपा के लोग और उनके गुजराती समर्थक मोदी की मर्दानगी की वाह वाही करेंगे. मोदी के मुंह से फिर छः करोड़ गुजराती निकलेगा जिसमे बिलकीस बानो शामिल नहीं होगी.

साभार: अखाड़े का उदास मुगदर

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समाजवाद का भविष्य

Posted by parisar on January 20, 2008

प्रोफेसर रणधीर सिंह हमारे समय के एक महत्वपूर्ण मार्क्सवादी विचारक  हैं नीचे वाली पोस्ट में हम उनका लेख ‘Future of Socialism’ प्रेषित कर रहे हैं हमें बहुत अफ़सोस है कि हम इसे हिन्दी में प्रेषित नहीं कर पाये यह लेख वास्तव में लालबहादुर वर्मा के संपादन में निकलने वाली अनूठी हिन्दी पत्रिका ‘इतिहासबोध‘ द्वारा आयोजित एक सेमिनार में प्रोफेसर रणधीर सिंह द्वारा दिए गए वक्तव्य पर आधारित हैइतिहासबोध’ की कोई वेबसाइट या ब्लॉग नहीं है जिसके कारण यह लेख इंटरनेट पर हिन्दी में उपलब्ध नहीं है इससे पहले  इसी ब्लॉग पर रणधीर कपूर के उत्तरआधुनिकता विषयक सुचिंतित लेख ‘Post-modernism - a marxist comment‘ को भी बहुत अच्छी प्रतिक्रियाएं मिली थीं दुर्भाग्य से वह भी हिन्दी  में उपलब्ध नहीं है हम सुधी पाठकों से इन दो लेखों का अनुवाद कर हमें मेल करने का अनुरोध करते हैं हमारा ईमेल पता है — parisarblog@gmail.com

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पहले…..

Posted by parisar on January 16, 2008

पहले तुम्हारे हाथ में थी बंदूक
तो ये तुम्हारी वीरता थी
अब मेरे हाथ में है बंदूक
तो ये मेरा जुर्म है

                                            –  कुलदीप प्रकाश

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न हो कुछ भी…..

Posted by parisar on January 2, 2008

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बिनायक सेन की कैद के मायने

Posted by parisar on December 26, 2007

तहलका हिन्दी

imageइसी महीने 10 दिसंबर को एक तरफ अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस मनाया जा रहा था तो दूसरी तरफ नागरिक अधिकारों के लिए लड़ने वाले एक शख्स की कैद लंबी हो रही थी. ये शख्स हैं इस साल मई से छत्तीसगढ़ की रायपुर जेल में बंद पीयूसीएल नेता डॉ. बिनायक सेन जिन्हें उच्चतम न्यायालय ने जमानत देने से इनकार कर दिया. 45 मिनट चली सुनवाई वहां मौजूद लोगों के लिए एक भयावह अनुभव था. अभियोजन पक्ष का दावा था कि सेन माओवादी हैं और उन्हें छोड़ने का मतलब होगा सरकार की जड़ें खोदने के लिए उन्हें खुली आजादी देना. परेशान करने वाली बात ये थी कि इस दावे की प्रामाणिकता जांचने की जरूरत ही नहीं समझी गई. डॉ सेन के कंप्यूटर रिकॉर्डों को तोड़मरोड़ कर पेश करते हुए सरकारी वकील ने अदालत को बताया कि इसमें वे पत्र हैं जिनसे ये पता लगता है कि किस तरह डॉ सेन ने नागपुर में हथियारों का प्रशिक्षण कैंप आयोजित

क्या फैसला सुनाने वाली खंडपीठ ने ये महसूस किया कि डॉ सेन के एक भी दिन जेल में रहने का मतलब है, छत्तीसगढ़ के धमतारी जिले में रहने