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रोबेस्पिया: मृत्यदंड के बारे में


(यह 22 जून 1791 को महान क्रांतिकारी रोबस्पेरे द्वारा फ़्रांस की संविधान सभा में दिये गए भाषण का हिंदी अनुवाद है. पाठक देख सकते हैं कि मृत्युदंड का विरोध किस तरह आज से ही नहीं बल्कि फ्रांस की क्रांति के समय से ही समाज के जनवादीकरण से जुडा हुआ है. और यह भाषण आज भी किस तरह प्रासंगिक बना हुआ है.)

एथेंस में जब खबर पहुंची कि अर्गोस नगर के नागरिकों को मृत्युदंड दिया गया है तो वहां के लोग भाग कर देवालयों में गए और उन्होंने देवताओं को आह्वान किया कि वे एथेंस के लोगों को ऐसे भयानक और क्रूर विचारों से बचाएं. मेरा आह्वान देवताओं से नहीं कानून निर्माताओं से है, उनसे जो देवत्व के शाश्वत नियमों के संचालक और भाष्यकार हैं, कि ऐसे खूनी कानूनों को फ़्रांस की संहिता से मिटा दे जो न्यायिक हत्याओं को निर्देशित करते हैं और जिनको उनकी नैतिकता और नया संविधान ख़ारिज करते हैं. मैं उनके समक्ष साबित करना चाहता हूँ : 1. कि मृत्युदंड सारतः अन्याय है. और 2. कि यह दण्डो में से सबसे दमनकारी नहीं है और यह अपराधों को रोकने से ज्यादा उन्हें संगुणित करता है.

नागरिक समाज के दायरे से बाहर यदि एक कटु शत्रु मेरा जीवन ख़त्म करने की कोशिश करता है, या बीसियों बार धकेलने पर भी मेरे द्वारा उगाई गई फसल को नष्ट करने वापस आ जाता है. तो क्योंकि मेरे पास विरोध के लिए केवल मेरी व्यक्तिगत शक्ति का ही सहारा है इसलिए मुझे उसे अनिवार्यतः नष्ट करना होगा या उसे ख़त्म कर देना होगा और प्राकृतिक रक्षण का नियम मुझे औचित्य और स्वीकृति प्रदान करता है. लेकिन समाज में, जब सभी की शक्ति केवल किसी एक व्यक्ति के खिलाफ लामबंद है तो न्याय का कौन सा सिद्धांत उसकी हत्या की स्वीकृति दे सकता है? कौन सी अनिवार्यता इसे दोषमुक्त कर सकती है? एक विजेता जो अपने बंदी शत्रु की हत्या करता है बर्बर कहलाता है! एक प्रौढ़ जो किसी बालक को शक्तिहीन कर उसे दंड देने की सामर्थ्य रखता है यदि उसकी हत्या कर दे तो राक्षस समझा जाता है! एक अभियुक्त जिसे समाज द्वारा सजा दी गई है एक पराजित और शक्तिहीन शत्रु के सिवा कुछ भी नहीं है और वह एक प्रौढ़ के सामने बालक से भी ज्यादा असहाय है.

अतः, सत्य और न्याय की नज़र में मौत के ये नज़ारे जिन्हें यह अनुष्ठानपूर्वक आदेशित करता है, कायराना कत्लों के सिवा कुछ भी नहीं है, ये केवल कुछ व्यक्तियों के बजाय समूचे राष्ट्र के द्वारा कानूनी तरीको से किये गये गंभीर अपराध है. कानून चाहे कैसे भी निर्मम और वैभवशाली क्यों न हों, हैरान मत होइए, ये चंद उत्पीड़कों के कारनामों से ज्यादा कुछ नहीं हैं. ये ऐसी काराएं हैं जिनसे मानव जाति को अधोपतित किया जाता है. ये ऐसी भुजाएं हैं जिनसे उसे पराधीन किया जाता है,
ये कानून खून से लिखे गए हैं. किसी भी रोमन नागरिक को मौत की सजा देना वर्जित था. यह जनता द्वारा बनाया गया कानून था. लेकिन विजयी स्काईला ने कहा : वे सभी जिन्होंने मेरे विरुद्ध अस्त्र उठाये मृत्यु के भागी हैं. ओक्टावियन और अपराध में उसके सहभागियों ने इस नए कानून की पुष्टि की.

तिबेरियस की अधीनता में ब्रूटस की प्रशंसा करना मृत्युयोग्य अपराध था. कालिगुला ने उन सबको मृत्युदंड दिया जिन्होंने भी सम्राट के चित्र के समक्ष नग्न होने की धृष्टता की. एक बार जब आतताई शासकों द्वारा राजद्रोह के अपराध – जो अवज्ञापूर्ण या नायकोचित कृत्य हुआ करते थे – का आविष्कार कर लिया गया तो फिर कौन बिना स्वयं को राजद्रोह का भागी बनाए यह सोचने की हिम्मत कर सकता था कि इनकी सजा मृत्युदंड से थोड़ी कम होनी चाहिए?

अज्ञानता और निरंकुशता के राक्षसी मिलन से पैदा हुए उन्माद ने जब दैवीय राजद्रोह के अपराध का आविष्कार कर लिया, जब इसने अपने मतिभ्रम में स्वयं ईश्वर का प्रतिशोध लेने का बीड़ा उठा लिया, तब क्या यह जरुरी नहीं हो गया था कि यह उन्हें रक्त अर्पित करे, और स्वयं को ईश्वर का ही रूप मानने वाले, उसे दरिन्दे की श्रेणी में पहुंचा दें?

पुरातन बर्बर कायदे के समर्थक कहते है कि मृत्युदंड अनिवार्य है, बिना इसके अपराध पर लगाम लगाना संभव नहीं है. यह आपसे किसने कहा? क्या आपने उन सभी अंकुशों का आकलन कर लिया है जिनके द्वारा दंडविधान मनुष्य की संवेदना पर काम करता है? अफ़सोस, मृत्यु से पहले मनुष्य कितना शारीरिक और नैतिक कष्ट सहन कर सकता है?

जीने की इच्छा उस आत्मसम्मान के सामने नतमस्तक हो जाती है, जो ह्रदय पर शासन करने वाले आवेगों में सबसे प्रबल होता है. एक सामजिक मनुष्य के लिए सबसे खतरनाक सजा अपमानित होना है, सार्वजनिक निंदा का पात्र बन जाना है. यदि कानून निर्माता नागरिक को इतनी सारी नाजुक जगहों पर चोट पहुंचा सकता है तो उसे मृत्युदंड के इस्तेमाल करने की हद तक क्यों गिर जाना चाहिए? दंड दोषी को यातना देने के लिए नहीं होता है, वरन वह उसके भय से अपराध को रोकने के लिए दिया जाता है.

जो कानून निर्माता मृत्यु और उत्पीड़नकारी सजाओं को अन्य तरीकों के ऊपर वरीयता देता है वह जनभावनाओं को आहत करता है और शासितों के बीच अपनी नैतिक साख को कमजोर करता है. एक ऐंसे ढोंगी गुरु की तरह जो बार बार की क्रूर सजाओं से अपने शिष्य की आत्मा को जड़ और अपमानित बना देता है. वह कुछ ज्यादा ही जोर से दबाकर सरकार की स्प्रिंगों को ढीला और कमजोर कर देता है.

जो कानून निर्माता म्रत्युदंड का विधान स्थापित करता है वह इस उपयोगी सिद्धांत का निषेध करता है कि किसी अपराध को दबाने का सबसे सही तरीका उन आवेगों की प्रकृति के अनुसार दंड तय करना है जोकि उसको पैदा करते हैं. मृत्युदंड का विधान इन सभी विचारों को धूमिल कर देता है यह सभी अन्तःसम्बन्धों को विघटित कर देता है और इस प्रकार दंडात्मक कानून के उद्देश्य का ही खुलेआम निषेध करता है.

आप कहते हैं कि मृत्युदंड अनिवार्य है. यदि यह सत्य है तो क्यों बहुत सारे लोगों को इसकी जरुरत नहीं पड़ी. विधि के किस विधान के तहत ऐसे लोग ही सबसे बुद्धिमान, सबसे खुश और सबसे स्वतंत्र थे? यदि मृत्युदंड ही बड़े अपराधों को रोकने के लिए सबसे उचित है तो ऐसे अपराध वहां सबसे कम होने चाहिए जहाँ इसे अपनाया और प्रयोग किया गया. किन्तु तथ्य एकदम विपरीत हैं. जापान को देखिये: वहां से ज्यादा मृत्युदंड और यातनाएं और कहीं नहीं दी जाती परन्तु वहां से अधिक संख्या में और वहां से अधिक जघन्य अपराध और कहीं नहीं होते. कोई कह सकता है कि जापानी लोग भीषणता में उन बर्बर कानूनों को चुनौती देना चाहते हैं जो उन्हें आहत और परेशान करते हैं. क्या यूनानी गणतन्त्रों -जहाँ सजाएँ नरम थी और जहां मृत्युदंड या तो बहुत कम थे या थे ही नहीं- में खूनी कानूनों द्वारा शासित देशों से ज्यादा अपराध और कम अच्छाइयां थी? क्या आपको लगता है की रोम में पोर्सियाई ज़माने में जब इसके वैभवशाली दिन थे, जब सारे कड़े कानूनों को हटा दिया गया था, स्काईला जो अपने अत्याचारों के लिए कुख्यात था, के जमाने की तुलना में ज्यादा अपराध होते थे, जब सभी कठोर कानूनों को वापस ले आया गया था? क्या रूस के निरंकुश शासक ने जब से मृत्युदंड को ख़त्म कर दिया है वहां किसी प्रकार का संकट आ खड़ा हुआ है? ऐसा लगता है कि इस तरह की मानवता और दार्शनिकता का प्रदर्शन करके वह लाखों लोगों को अपनी निरंकुश सत्ता के अधीन रखने के जुर्म से दोषमुक्त होना चाहते हैं.

न्याय और विवेक की बात सुनिए. ये आपको चिल्ला कर कह रहे हैं कि मानवीय निर्णय कभी भी इतने निश्चित नहीं होते कि वे कुछ मनुष्यों द्वारा जो कि गलतियाँ कर सकते हैं, किसी अन्य व्यक्ति की मृत्यु के बारे में तय करने के औचित्य का प्रतिपादन कर सकें. यदि आप सबसे सम्पूर्ण न्यायिक फैसले की भी कल्पना कर लें, यदि आप सबसे ज्यादा ज्ञानी और ईमानदार जजों की भी व्यवस्था कर लें तब भी गलतियों की संभावना बची रहती है. आप इन गलतियों को सुधारने के औजारों से स्वयं को क्यों वंचित कर देना चाहते हैं? स्वयं को किसी उत्पीडित निर्दोष की मदद करने में अक्षम क्यों बना देना चाहते हैं? क्या किसी अदृश्य छाया के लिए, किसी अचेतन राख के लिए आपके बाँझ पाश्चाताप का, आपकी भ्रामक भूलसुधार का कोई अर्थ है? वे आपके दंड विधान की बर्बर तत्परता के त्रासद साक्ष्य हैं. अपराध को पाश्चाताप और अच्छे कार्यों के द्वारा सुधार सकने की संभावना को किसी व्यक्ति से छीन लेना, अच्छाई की तरफ उसके लौट आने के सारे रास्ते निर्ममता से बंद कर देना, उसके पतन को शीघ्रता से कब्र तक पहुंचा देना जो अब भी उसके अपराध से दागदार है, मेरी नज़र में क्रूरता का सबसे भयावह परिष्करण है.

एक कानून निर्माता का सबसे पहला कर्तव्य उन सार्वजनिक नैतिक मूल्यों की स्थापना करना और उन्हें बचाए रखना है, जो सभी आज़ादियों और सभी सामाजिक खुशियों के मूल स्रोत हैं. किसी विशिष्ट उद्देश्य को पाने के प्रयास में यदि वह सामान्य और आवश्यक उद्देश्यों को भूल जाता है तो वह सबसे भौंडी और भयानक गलती करता है. अतः राजा को लोगों के सामने न्याय और विवेक का सबसे आदर्श उदहारण पेश करना चाहिए. यदि इस को परिभाषित करने वाली शक्तिशाली, संयत, और उदार सख्ती की जगह क्रोध और प्रतिशोध से काम लेते हैं, यदि वे बिना वजह के खून बहाते हैं, जिसको बचाया जा सकता था और जिसे बहाने का उन्हें कोई अधिकार नहीं. और वे लोगों के सामने निर्मम दृश्य, और यातना से विकृत लाशों को प्रस्तुत करते हैं तो यह नागरिकों के जेहन में न्याय और अन्याय के विचार को बदल देता है. वे समाज में ऐसे तीखे दुराग्रहों के बीज बो देते हैं जो उतरोतर बढ़ते जाते हैं. मनुष्य, मनुष्य होने की गरिमा खो देता है जब उसके जीवन को इतनी आसानी से जोखिम में डाला जा सकता है. हत्या का विचार तब इतना डरावना नहीं रह जाता जब कानून खुद ही इसे एक मिसाल और तमाशे की तरह पेश करता है. अपराध की भयावहता तब कम हो जाती है जब उसे एक और अपराध के जरिये दण्डित किया जाता है. किसी दंड की प्रभावपूर्णता को उसकी कठोरता की मात्रा से मत आंकिये: ये दोनों एक दूसरे के एकदम उलटी बाते हैं. हर कोई उदार कानूनों की सहायता करता है. हर कोई कठोर कानूनों के खिलाफ षड्यंत्र करता है.

यह देखा गया है की स्वतंत्र देशों में अपराध कम हैं और दंडात्मक कानून ज्यादा उदार हैं. कुल मिलाकर, स्वतंत्र देश वे हैं जहाँ व्यक्ति के अधिकारों का सम्मान किया जाता है और इसके फलस्वरूप जहाँ के कानून न्यायपूर्ण हैं. जहाँ अतिशय कष्ट देकर मानवता का उल्लंघन किया जाता है यह इस बात का प्रमाण है कि वहां मनुष्यता की गरिमा को अभी पहचाना नहीं गया है, यह इस बात का प्रमाण है कि वहां कानून निर्माता स्वामी है जो दासों को चलाता है और अपनी मर्जी के मुताबिक जब चाहे उन्हें सजाएं देता है. अतः मेरा निष्कर्ष है कि मृत्युदंड को समाप्त कर देना चाहिए.

(अनुवाद: कुलदीप प्रकाश)

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April 3, 2013 - Posted by | A World to Win, articles, Breaking with the old ideas, Education, History, movements, pedagogy of oppressed, statements

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