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फिर से शुरुआत

बहुत दिन बाद फिर से शुरुआत करते हैं अंशु मालवीय की पाखी में छपी इस कविता से –

हरियाली के आखेटक

-अंशु मालवीय

अब चल पड़ी है बस्तर में कहावत एक
कि जैसे-
पावर प्लांट वालों के घर बच्चे पैदा होते हैं
पावर के साथ,
स्टील प्लांट वालों के द्घर बच्चे पैदा होते हैं,
लोहे के दाँतों के साथ,

मुरिया गोंड के घर बच्चे पैदा होते हैं,
अपनी धरती अपने साथ लेकर!
नाभि-नाल से जुड़ी, एक अदद अपनी
गर्भ-द्रव में सनी लथपथ हरियाली धरती…
जनम के समय, पुरखों की छाती का नगाड़ा
पैरों से बजाता-नाचता है गाँव-आसमान से चूती है
चाँदनी महुए सी,
नन्हें बच्चों की लार में बहती है नमी वीरान जंगलों की
दण्डकारण्य के सन्नाटे में शोर मचाता चित्रकूट का झरना फूटता है
उनकी किलकारियों में,
साल के पुराने वृक्ष उनके पैरों की नसों में उतरते
धंसते चले जाते हैं, पानी की तलाश में चट्टानों को तोड़ते
जड़ें फैलती जाती हैं
पुकारती मिट्टी के भीतर… ‘इन्द्रावती-इन्द्रावती’…
इन्द्रावती की लहरों के पालने में झूलते हैं दिग-दिगंत
नीले वितान तले हरे… बहुत हरे… गाढ़े काही स्वप्न!
फैलती हैं साल की जड़ें-बॉक्साइट की सहलाती
कोयले से लिपटती, लोहे को पुचकारती
फैलती जाती हैं जड़ें नियामगिरी से बैलाडीला तक
पारादीप से झरिया तक धरती में रक्त का प्रवाह लेकर
भागती, अति नवीन पुरातन जड़ें
धरती की निद्रा में स्वप्न रेशों सी फैलती जड़ें
दामोदर के पेट की आग लेकर कोयलकारो में बुझाती
इन्द्रावती में तैरती काइयों के शव
सुवर्णरेखा के जहरीले पानी में बहाती
फैलती जाती हैं जड़ें निर्भीक, उदास और उजड्ड जड़ें।
मादल की थाप पर उड़ती है चील एक विकल बदहवास
आसमान के गुम्बद में लेकर उड़ती है कोयले का चाँद
और मारती है टिहकारी
…टिहकारी से गिरती है बिजली
जन्मजात विकृत बच्चों की एक पाठशाला पर
पाठशाला पर लिखा है… रेडियोएक्टिव शिक्षा के केंद्र
जा… दू… गो… ड़ा… में आपका स्वागत है।
वहाँ से दूर संथाल परगना के किसी जंगल में
अपने टूटे हुए धनुष से पथरीली जमीन को कुरेदते
तिल्का माँझी की आँख से रक्त के सोते फूटते हैं…
बुदबुदाता है अकेला बैठा… सुनो… सुनो
शोर है बहुत, कैटरपिलर का शोर ऊँचा होता जा रहा है
सुनो शोर है बहुत… बारूद का, ट्रकों का, सरकारी गाड़ियों का
कोयले की गर्द आसमान की आँखों में पैठती जाती है
तिल्का माँझी बुदबुदाता है…
क्या बोलता है अपने टूटे हुए धनुष से कुरेदते हुए पथरीली जमीन
बुदबुदाता है- धरती… धरती… धरती…!
धरती… धरती… धरती…!
‘धरती के हम मालिक नहीं… हम रखवाले हैं।
सौंपनी है धरती हमें अपनी वाली पीढ़ी को… कैसी धरती?’
अपने घावों का मुँह बंद करती काली-लाल मिट्टी से
हवा भागती है-
जंगल दर जंगल, पहाड़ दर पहाड़
गाँव से शहर-शहर से झोपड़पट्टियों तक
अल्मुनियम का कटोरा थामे… उसी अल्मुनियम का
जिसके लिए बॉक्साइट की खदानों को अपना यौवन दिया था उसने
उत्पादक-मजदूर-भिखारन हवा
उसी लोहे की बेड़ियाँ पहने, जिसकी खानों में उड़ती गर्द ने
उसके फेफड़ों में घोसला बनाया… है, खाँसती, खामोश हवा।
कहानी सुनाती है हवा, जले हुए वृक्षों के आधे धड़ों को-
‘बहुत-बहुत’ समय पहले की बात हैऋ इस जंगल में
एक राष्ट्र, राज करता था-
उसने नदियों को बोतलों में बंद किया
-उसने वृक्षों को गमलों में कैद किया
-उसने जमीन का लोहा खींचा
-और उससे पलंग बनाकर सो गया
ये खदानों के विस्फोट नहीं राष्ट्र के खर्राटे हैं
ये बाँधों में लहरों के थपेड़े नहीं राष्ट्र की करवटें हैं
जिसके नीचे कुचल जाती हैं
सभ्यताएँ
भाषाएँ
ज्ञान
और संस्कृतियाँ…।
उसके राज में रोटियाँ, चिमटों की गुलाम थीं
साहित्य चुगली के काम आता था
इतिहास बलि माँगता था
और विज्ञान- सामूहिक नरसंहारों की मनोरंजक फ़िल्में बनाता था।
…कहानी की लय टूटती है…
भौंकते आते हैं ‘ग्रे हाउण्ड’ मिथ्या शहादत की राष्ट्रीय दुम हिलाते
उनके बूटों से चरमराते हैं पत्ते, बच्चों की पसलियों जैसे
उनके पीछे आते हैं अर्थशास्त्री ग्रोथ रेट का नगाड़ा पीटते
उनके पीछे आते हैं उद्योगपति-ठेकेदार-माफ़िया विकास का गंडासा लिए
उनके पीछे आते हैं मंतरी-संतरी, दलाल-अफसर
संगीनों पर लटके सहमति पत्र लिए
फ़िर आता है कैमरे, कपड़े और आँकड़े चमकाता मीडिया
अंत में आती है हरियाली… हमेशा की तरह विनम्र और महान
गरदन उतारे जाने के ठीक पहले
अपनी गरिमामय मृत्यु को निहारती है स्नेह से
और नजर डालती है पूरे अमले पर
बोलती है
ठीक वैसी ही आवाज में जैसे सावन-भादो की स्याह रातों को
उमड़ते हुए बादल बोलते हैं-
‘बड़े-बड़े प्रतापी राजा चले गये
धर्मराज युधिष्ठिर भी गये खाली हाथ
ये धरती किसी के साथ नहीं गई
हे राजन!
ये तुम्हारे साथ भी नहीं जाएगी।’

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July 21, 2010 - Posted by | कविता, हिन्दी, movements, tribal life

1 Comment »

  1. phir se shuruat jaruri thi. achhi bhi lagi.

    Comment by avani | August 3, 2010


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