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सहानुभूति के खिलाफ युद्ध

Posted by parisar on March 20, 2008

20 दिसंबर 2007 को आंतरिक सुरक्षा विषय पर आयोजित मुख्यमंत्रियों के एक सम्मेलन में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक नाटकीय बयान दिया, “नक्सली देश के महत्वपूर्ण आर्थिक ढांचे को निशाना बना रहे हैं। उनका मकसद यातायात और दूसरी सुविधाओं को तहस नहस करना और साथ ही विकास की गति को धीमा करना है। वो स्थानीय स्तर के झगड़ों जैसे ज़मीन का मसला या फिर दूसरे छोटे मोटे विवादों में भी हस्तक्षेप कर रहे हैं। मैंने पूर्व में भी कई बार कहा है कि वामपंथी उग्रवाद संभवत: भारत की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। ऐसा अभी भी है और हम तब तक शांति से नहीं बैठ सकते जब तक कि ये विषाणु पूरी तरह से समाप्त नहीं हो जाता।” इसके बाद उन्होंने राज्यों को इस बात का विश्वास भी दिलाया कि नक्सलवादी ताकतों को पंगु बनाने के लिए सुरक्षा बलों के आधुनिकीकरण पर और ज्यादा निवेश किया जाएगा।

प्रधानमंत्री का बयान ऐसे समय में आया था, जब तमाम राज्यों में पुलिस लगातार ऐसे किसी भी व्यक्ति से निपटने के अभियान में जुटी हुई थी, जो अति वामपंथी विचारधारा से किसी भी तरह की सहानुभूति रखने वाला प्रतीत हो रहा था। इस काम के लिए पुलिस के पास कई घातक हथियार थे–ग़ैरक़ानूनी गतिविधि नियंत्रण एक्ट 1967, छत्तीसगढ़ स्पेशल पब्लिक सिक्योरिटी एक्ट 2005, आंध्र प्रदेश पब्लिक सिक्योरिटी एक्ट 1992, ऐसे क़ानून जो सरकार को ये अधिकार देते हैं कि जो विचारधारा या राजनीति उसे पसंद नहीं है उनसे जुड़े किसी भी व्यक्ति को वो गिरफ्तार कर सकती है और संविधान में मौजूद नागरिकों के मूलभूत अधिकारों के साथ खिलवाड़ कर सकती है.

गोविंदन कुट्टी, प्रफुल्ल झा, पित्ताला श्रीशैलम और लचित बारदलोई- ये सारे पत्रकार (या पूर्व पत्रकार) या फिर मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं। इन्हें नक्सली होने या उनसे सहानुभूति रखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। केवल बारदोलोई इनमें अपवाद हैं, जिनके ऊपर उल्फा से संबंध रखने का भी आरोप है। गिरफ्तारियों की ये बाढ़ चिंता में डालती है। इनमें से ज्यादातर मामलों में किसी तरह की हिंसा या फिर किसी तरह के अपराध के कोई आरोप नहीं रहे। इनके ऊपर सिर्फ उग्रवादी गुटों से सहमति रखने या फिर इस तरह के लोगों से संबंध रखने के आरोप हैं। इसलिए ये गिरफ्तारियां सरकार की बढ़ती असहिष्णुता की गवाही देती हैं जिसके तहत सरकार के समर्थक न होने और वर्तमान आर्थिक नीतियों के खिलाफ चलने वाली किसी भी राजनीतिक विचारधारा के लिए कोई स्थान नहीं है।

नीचे कुछ मामलों का संक्षेप में विवरण है–

प्रशांत राही

48 साल का ये मानवाधिकार कार्यकर्ता “द स्टेट्समैन” का उत्तराखंड में संवाददाता था। इन्हें 22 दिसंबर 2007 को उत्तराखंड में हंसपुर खट्टा के जंगलों से गिरफ्तार किया गया था। इनके ऊपर प्रतिबंधित सीपीआई (माओवादी) समूह का ज़ोनल कमांडर होने का आरोप है। राही पर भारतीय दंड संहिता की तमाम धाराएं थोपी गई हैं इसमें ‘ग़ैरक़ानूनी गतिविधि नियंत्रण एक्ट’ भी शामिल है। इस संबंध में रुद्रपुर के एसएसपी पीवीके प्रसाद से पूछे जाने पर उनका जवाब था– “जाइए जेल में खुद उन्ही से पूछ लीजिए। जिस तरह की गतिविधियों में वो लिप्त था उसकी मैं चर्चा भी नहीं कर सकता।” राही की बेटी शिखा जो कि मुंबई में रहती हैं उनसे 25 दिसंबर 2007 को ऊधमसिंह नगर ज़िले के नानक मत्था थाने में मिली थीं। शिखा उनसे हुई बातचीत के बारे में बताती हैं– “उन्हें 17 दिसंबर 2007 को देहरादून से गिरफ्तार किया गया था। अगले दिन उन्हें हरिद्वार ले जाया गया, जहां उन लोगों ने उन्हें पीटा और उनकी गुदा में मिट्टी का तेल डाल देने की धमकी दी। पुलिस वालों ने उनसे ये भी कहा कि वो उन्हें अपने सामने मेरा बलात्कार करने के लिए मजबूर कर देंगे। अंतत: 22 दिसंबर 2007 को पुलिस ने उनकी गिरफ्तारी दिखाई।”

“राही की गिरफ्तारी का समय प्रधानमंत्री के बयान से बिल्कुल मेल खाता है जिसमें उन्होंने माओवादी उग्रवाद को देश के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया था। राज्य के मुख्यमंत्री ने इस सम्मेलन में पुलिस बलों के आधुनिकीकरण के लिए केंद्र से 208 करोड़ रूपए की मांग की थी”, राही के पूर्व सहयोगी और स्वतंत्र पत्रकार हरदीप कहते हैं। उनके एक औऱ मित्र और ‘गढ़वाल पोस्ट’ के संपादक अशोक मिश्रा मानते हैं कि राही को सिर्फ उनकी राजनीतिक विचारधारा की वजह से परेशान किया जा रहा है। “वो वामपंथी विचारधारा के हैं और तमाम जन आंदोलनों में शामिल रहे हैं जिनमें नए राज्य का निर्माण और टिहरी बांध के विरोध का आंदोलन भी शामिल है। उन्होंने राही को इसलिए गिरफ्तार किया है क्योंकि वो ऊधमसिंह नगर में ज़मीन, शराब और बिल्डिंग माफिया के खिलाफ लोगों को गोलबंद करने में लगे हुए थे। मुझे सिर्फ इसी बात की खुशी है कि पुलिस ने उनके साथ एके-47 नहीं दिखाई या फिर उन्हें फर्जी एनकाउंटर में मार नहीं गिराया।”

पित्ताला श्रीसैलम

ऑनलाइन टेलिविज़न मुसी टीवी में एडिटर और तेलंगाना जर्नलिस्ट फोरम(टीजेएफ) के सह संयोजक, 35 वर्षीय श्रीशैलम को उनके मुताबिक 4 दिसंबर 2007 को गिरफ्तार किया गया था। लेकिन पुलिस के दस्तावेजों की मानें तो उन्हें 5 दिसंबर को आंध्र प्रदेश के प्रकाशम ज़िले से गिरफ्तार किया गया था। उनके ऊपर माओवादियों का संदेशवाहक होने का आरोप लगाया गया था। “मैं एक माओवादी नेता का साक्षात्कार करने गया था और पुलिस ने मेरे ऊपर माओवादियों की मदद करने के फर्जी आरोप जड़ दिए,” श्रीशैलम बताते हैं। उन्हें 13 दिसंबर को छोड़ दिया गया। मुसी टीवी और तेलंगाना जर्नलिस्ट फोरम दोनो ही अलग तेलंगाना राज्य के समर्थकों में से हैं।

उनके सहयोगी और टीजेएफ के संयोजक अल्लम नारायण इसके पीछे सरकार का विरोध करने वालों को कुचलने की साज़िश देखते हैं। “श्रीशैलम की गिरफ्तारी के बाद सरकार ने ये कहना शुरू किया कि टीजेएफ के भी माओवादियों से संबंध हैं। लेकिन हम पत्रकार हैं औऱ हमें अपनी सीमाएं मालूम हैं। हमारा एकमात्र लक्ष्य है पृथक तेलंगाना राज्य और इसे हम संसदीय व्यवस्था के तहत हासिल करेंगे।” श्रीशैलम स्पष्ट करते हैं कि किसी पत्रकार या सामाजिक कार्यकर्ता के लिए गरीबों और जंगलों में रह रहे दबे कुचलों से मिलना कोई आसामान्य बात नहीं है, किसी मौके पर माओवादियों से भी मुलाक़ात हो सकती है। वो सफाई देते हैं- “लेकिन इससे कोई माओवादी नहीं बन जाता।”

गोविंदन कुट्टी

पीपुल्स मार्च के तेज़ तर्रार संपादक गोविंदन कुट्टी को केरल पुलिस ने 19 दिसंबर 2007 को गिरफ्तार किया था। उनके ऊपर प्रतिबंधित माओवादी संगठनों से अवैध संबंध रखने का आरोप था। ग़ैरक़ानूनी गतिविधि नियंत्रण एक्ट (1967) के तहत गिरफ्तार किए गए कुट्टी 24 फरवरी 2008 को ज़मानत पर रिहा हुए हैं। वापस लौटते ही उन्हें अपने घर पर एर्नाकुलम के ज़िला मजिस्ट्रेट का आदेश चिपका मिला। इसमें कहा गया था कि पीपुल्स मार्च का रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया गया है। इसमें प्रकाशित सामग्री “बगावती है जो कि माओवादी विचारधारा के जरिए भारत सरकार के प्रति अपमान और घृणा की भावना फैलाती है।”

लेकिन इसका प्रकाशन शुरू होने के सात सालों बाद अब ऐसा क्यों? ” इसके लेख भारतीय राष्ट्र की भावना के विरोध करने वाले हैं। पुलिस काफी पहले ही पत्रिका पर प्रतिबंध लगाना चाहती थी लेकिन इस पर सबका ध्यान कुट्टी की गिरफ्तारी के बाद ही गया”, एर्नाकुलम के डीएम एपीएम मोहम्मद हनीश कहते हैं। बहरहाल कुट्टी मानते हैं कि सरकारी नीतियों से विरोध रखने वाले किसी भी व्यक्ति पर माओवादी ठप्पा लगाना उससे निपटने का सबसे आसान तरीका बन गया है। वो दृढ़ता से कहते हैं अगर किसी विचारधारा का समर्थन करना उन्हें माओवादी बना देता है तो वो खुद को माओवादी कहलाने के लिए तैयार हैं। “चार तरफ हिंसा ही हिंसा फैली हुई है। भ्रष्टाचार हिंसा है, वैश्यावृत्ति हिंसा है, न्यूनतम मेहनाता नहीं देना हिंसा है, बालश्रम हिंसा है, जातिगत भेदभाव हिंसा है,” वो आगे जोड़ते हैं, “मैं क़ानून का पालन करने वाला नागरिक हूं।”

प्रफुल्ल झा

छत्तीसगढ़ में पीयूसीएल के अध्यक्ष राजेंद्र सेल के शब्दों में– “प्रफुल्ल झा छत्तीसगढ़ के दस सर्वश्रेष्ठ मानवविज्ञानियों में हैं। वो एक ऐसे पत्रकार हैं जिनके विश्लेषण तमाम राष्ट्रीय समाचार चैनलों में अक्सर शामिल किए जाते हैं।” 60 वर्षीय दैनिक भाष्कर के इस पूर्व ब्यूरो प्रमुख को 22 जनवरी 2008 को गिरफ्तार किया गया था। उनके ऊपर रायपुर पुलिस द्वारा पकड़े गए हथियारों के एक ज़खीरे से संबंध होने का आरोप है। “उन्हें और उनके बेटे को नक्सलियों ने कार खरीदने के लिए पैसे दिए ताकि वो नक्सली नेताओं और हथियारों को इधर से उधर भेज सकें। वो नक्सली साहित्य का हिंदी में अनुवाद भी किया करते थे”, कहना है छत्तीसगढ़ के डीजीपी विश्वरंजन झा का। वो आगे कहते हैं, “कृपया उन्हें पत्रकार मत कहिए।”

डेली छत्तीसगढ़ के संपादक सुनील कुमार अपनी बात वहीं से शुरू करते हैं जहां डीजीपी साहब अपनी बात खत्म करते हैं। “उनके मामले का मीडिया उसकी आज़ादी के हनन से कुछ भी लेना-देना नहीं है। वो नक्सलियों के एक सक्रिय और वेतनभोगी कार्यकर्ता थे।” कुमार बताते हैं कि झा को इससे पहले भी एक पब्लिकेशन कंपनी ने पैसों के गबन के आरोप में बाहर निकाल फेंका था। लेकिन सेल मानते हैं कि चाहे डा. बिनायक सेन हो या झा इनकी गिरफ्तारी का मकसद सरकारी नीतियों के खिलाफ उठने वाली आवाज़ों को दबाना ही है। उनके मुताबिक, “ये मेरा विश्वास है कि झा नक्सली नहीं हैं। ये कहना सही नहीं होगा कि वो पत्रकार नहीं हैं।”

लछित बारदोलोई

मानवाधिकार कार्यकर्ता और स्वतंत्र पत्रकार लछित, सरकार और उल्फा के बीच बातचीत में लंबे समय से मध्यस्थ की भूमिका निभाते रहे हैं। उन्हें 11 जनवरी 2008 को असम के मोरनहाट से गिरफ्तार किया गया। आरोप लगे कि वे उल्फा के साथ मिलकर गुवाहाटी हवाई अड्डे से एक जहाज को अपहरण करने की योजना से रिश्ता रखते थे। इस हाईजैकिंग की योजना का मकसद असम के रंगिया कस्बे में पुलिस द्वारा 2007 में जब्त किए गए हथियारों को छुड़वाना और उल्फा के लिए धन इकट्ठा करना था। आरोपों के बारे में गुवाहाटी के एसएसपी वी के रामीसेट्टी कहते हैं, “अपहरण के मामले में, हमें उल्फा के एक गिरफ्तार आतंकी ने बयान दिया है जिसमें उसने खुद के और बारदोलोई के शामिल होने की बात कही है।”

मानवाधिकार संस्था मानव अधिकार संग्राम समिति(एमएएसएस)—जिसके बारदोलोई महासचिव हैं– के अध्यक्ष बुबुमनी गोस्वामी पुलिस के आरोप को पूरी तरह से नकार देते हैं। । गोस्वामी बताते हैं, “कुछ सरकारी अधिकारी और पुलिस वाले उल्फा समस्या को हल ही नहीं होने देना चाहते। केंद्र हमेशा विरोधी गतिविधियों को रोकने के लिए मोटी रकम जारी करता है। अगर वर्तमान हालत जारी रहेंगे तो उनका फायदा भी जारी रहेगा।” बारदोलोई के वकील बिजन महाजन अपने मुवक्किल के रंगिया मामले में शामिल होने के आरोपों को सिरे से नकार देते हैं। “अगर ये बात सच थी तो जांच एजेंसियों को उन्हें तुरंत गिरफ्तार करना चाहिए था। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। ये सीधे सीधे पिक एंड चूज़ की राजनीति है जिसमें राज्य शामिल है।”

इन पांचो गिरफ्तारियों का समय और प्रकृति, क्या प्रधानमंत्री के मुताबिक देश की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती के प्रति बढ़ती सरकार की बेचैनी की ओर इशारा नहीं करते? तथ्य भी इसकी पुष्टि करते हैं। 11वीं पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत आंतरिक सुरक्षा के मद में सरकार ने 2500 करोड़ रूपए का प्रावधान किया है। इसमें केंद्रीय और राज्य सुरक्षा बलों के उपकरणों का सुधार भी शामिल है। ये 10वीं योजना में जारी की गई रकम से करीब करीब चार गुना ज्यादा है। पुलिस आधुनिकीकरण योजना के तहत साल 2005 के बाद से देश के नक्सल प्रभावित 76 ज़िलों में पुलिस के आधारभूत ढांचे को मजबूत करने के लिए हर साल दो-दो करोड़ रूपए मिलते हैं।

सरकार का नक्सलियों से निपटने का तरीका पूरी तरह क़ानून व्यवस्था की समस्या से निपटने वाला है। इसकी सामाजिक-आर्थिक जड़ों की अनदेखी की अक्सर कड़ी आलोचना होती रहती है। “सरकार उन सभी वामपंथी कार्यकर्ताओं को निशाना बना रही है जो नक्सलवादियों और माओवादियों के प्रति सरकारी नीतियों को उजागर कर रहे हैं। इसके अलावा सरकार द्वारा ज़मीन अधिग्रहण गतिविधियों का विरोध करने वालों को भी निशाना बनाया जा रहा है”, कहना है नागरिक अधिकारों के वकील प्रशांत भूषण का। वो आगे कहते हैं, “शांतिप्रिय कार्यकर्ताओं को निशाना बनाकर देश में नक्सलवाद को बढ़ावा ही मिलेगा क्योंकि इससे उन्हें मजबूरन भूमिगत होना पड़ेगा और अंतत: माओवादियों का हाथ थामना होगा।”

शोभिता नैथानी तहलका से

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