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आखिर मेरा कसूर ही क्या है?

Posted by parisar on February 14, 2008

तसलीमा नसरीन

मैंने ऐसा कुछ भी नहीं किया जो गलत हो. इसके बावजूद चार महीने तक मुझे कोलकाता में नज़रबंद रखा गया. मुझे घर से बाहर जाने की इजाज़त नहीं थी. सरकार बार-बार मुझसे देश या फिर राज्य छोड़ने के लिए कहती रही, कहती रही कि यहां से कहीं और चली जाओ. मगर मैंने कोलकाता छोड़ने से इनकार कर दिया. उस घर को छोड़ने से इनकार कर दिया जिसे मैंने बड़ी मेहनत से बसाया था. मैंने इनकार किया क्योंकि मुझे इसे छोड़ने की कोई वजह नजर नहीं आयी. मैं ये यकीन ही नहीं कर पा रही थी कि मेरी वजह से शहर में दंगे भी हो सकते हैं. मुझे इस बात पर विश्वास ही नहीं होता था कि मेरी वजह से शहर में लोगों की जानें जा सकती हैं. मैं इस शहर में पूरी तरह से सुरक्षित महसूस करती हूं. कोलकाता की सड़कों पर मैं बिना किसी डर के घूमी हूं, एक भी सुरक्षाकर्मी के बगैर. एक भी कट्टरपंथी से मेरा सामना नहीं हुआ. जो भी मेरे नज़दीक आया उसने ऐसा सिर्फ इसलिए किया क्योंकि वो मुझे चाहता था. एक दो मुस्लिम नेताओं ने जरूर कभी-कभी मेरे खिलाफ बयान दिये क्योंकि इससे उनके कुछ राजनीतिक स्वार्थ पूरे होते थे. इसलिए नहीं कि इसका उनकी धार्मिक भावनाओं से कुछ लेना-देना था.

मुझे पूरा यकीन है कि 21 नवंबर को हुई हिंसा का मेरे साहित्य से कोई लेना-देना नहीं था. अगर ऐसा होता तो ‘द्विखंडिता’ से विवादित अंशों को हटाने के बाद मेरा कोलकाता लौट पाना मुमकिन हो जाता. मैं जानती हूं कि 21 नवंबर को जिन लोगों ने सड़कों पर उत्पात मचाया वो मेरे साहित्य के बारे में पूरी तरह से अनजान थे. जिस नफ़रत और नाराज़गी का प्रदर्शन करते हुए उन्होंने पुलिस पर पथराव किया वो किसी दूसरी वजह से उपजी थी. वो शहर में मेरे रहने को लेकर नाराज़ नहीं थे.

मुझे राज्य से बाहर भेजने की साज़िश तो काफी लंबे समय से चल रही थी. मगर 22 नवंबर को किसी तरह से इसकी परिणति कर दी गई. मगर मेरा कसूर क्या था? मैंने क्या अपराध किया था कि कोलकाता में मुझे अपने ही घर में कैद कर दिया गया. किस गुनाह के लिए मुझे कोलकाता से निकाला गया? क्या कसूर है मेरा जिसके लिए मुझे दिल्ली में इस अनजान जगह पर एक कमरे में कैद रहने की सज़ा भुगतनी पड़ रही है. ऐसा कमरा जिसके बाहर जाने की मुझे इजाजत नहीं है और न ही इसमें मेरा कोई दोस्त और रिश्तेदार ही मुझसे मिलने आ सकता है. क्यूं मैं अनिश्चितता, निराशा और अकेलेपन का जीवन जीने को मजबूर हूं? मुझे ऐसे माहौल में क्यूं रखा गया है जिसमें मेरा सांस तक लेना दूभर है? मेरा कसूर आखिर है क्या?

केंद्र सरकार कह रही है कि वह मुझे सुरक्षा दे रही है. मगर ये किस तरह की सुरक्षा है? क्या किसी को कैद रखकर भी कोई सुरक्षा दी जाती है? जेल में भी कम से कम मिलने का तो तय समय होता है. यहां तो वो भी नहीं. जेल में रहने वाले अपराधियों को कम से कम ये तो पता होता है कि उनकी रिहाई कब होगी. मुझे तो पता ही नहीं कि कब मुझे इस असहनीय अकेलेपन, अनिश्चितता और जानलेवा खामोशी से आज़ादी मिलेगी.

मुझे कोलकाता छोड़ने को मजबूर किया गया. कहा गया कि कहीं भी जाओ, किसी भी दूसरे देश या राज्य में. इस अनजान जगह पर मुझे कैद रखने का मकसद तो मुझे यही लग रहा है कि मैं परेशान होकर देश छोड़ दूं. अगर ऐसा नहीं है तो मुझे इन ज़ंजीरों से क्यों जकड़ा जा रहा है? मुझे कोलकाता वापस जाने की इजाज़त क्यों नहीं दी जा रही.

क्यों मुझे दिल्ली में भी एक आम जिंदगी जीने से रोका जा रहा है? दिल्ली में तो किसी ने मेरे खिलाफ प्रदर्शन नहीं किए. न ही मुझे जान से मारने की धमकियां मिलीं. बल्कि यहां तो समाज के उदार और जागरूक लोगों ने मेरे समर्थन में आवाज़ भी उठाई. कई बुद्धिजीवी मेरे अभिव्यक्ति के अधिकार का बचाव करते हुए मेरी आज़ादी के लिए अधिकारियों को पत्र लिख रहे हैं. इसके बावजूद मुझे क्यों सलाखों के पीछे ज़िंदगी गुज़ारनी पड़ रही है? जब किसी को धमकी मिलती है तो उसे सुरक्षा इसलिए दी जाती है कि वो अपनी जिंदगी बिना किसी दिक्कत के जी सके. क्या जिस किसी को भी कोई धमकी मिलती है उसे किसी अनजान जगह पर छिपाकर उसकी आवाजाही पर रोक लगा देनी जाहिए?

मैं इस देश को छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगी क्योंकि दुनिया में कोई ऐसा दूसरा देश नहीं है जिसे मैं अपना घर कह सकूं. इस देश में सबसे ज़्यादा खतरा मेरी जान को ही नहीं है. किसी भी देश में कोई भी किसी को धमकी दे सकता है. पिछले 13 सालों में मुझे लगातार एक देश से दूसरे देश में भटकना पड़ा है. ऐसा कट्टपंथियों की धमकियों की वजह से नहीं बल्कि कट्टरपंथियों से अपने स्वार्थ पूरे करने वाली राजनीति की वजह से हुआ है. 1994 में बांग्लादेश से मुझे कट्टरपंथियों ने नहीं बल्कि वहां की सरकार ने निकाला था. आज भी मुझे अपने देश में वापस लौटने की इजाज़त नहीं है. ये आदेश कट्टरपंथियों की ओर से नहीं बल्कि सरकार की तरफ से है. मुझे नहीं लगता कि सरकार मेरी सुरक्षा को लेकर चिंतित है. बांग्लादेश की सरकार को तो सिर्फ अपनी सुरक्षा की ही चिंता है.

मैं ये सोचना ही नहीं चाहती कि भारत दूसरा बांग्लादेश है. मुझे पूरा विश्वास है कि जो थोड़ी-बहुत सुरक्षा की जरूरत है, उसे देकर भारत सरकार मुझे सामान्य जिंदगी देने की इजाज़त दे सकती है. क्या मेरी वजह से दंगे हो जाएंगे, क्या मेरे कारण लोगों की जानें जाएंगी? इस तरह के डर बेबुनियाद हैं. मेरी वजह से कहीं भी कोई दंगा नहीं हुआ. एक लेखक के कारण दंगे नहीं होते. किताब पर प्रतिबंध लगने से पहले और हाईकोर्ट द्वारा प्रतिबंध हटाए जाने के बाद किताब की बिक्री बिना किसी बाधा के हुई है. किसी ने किताब के खिलाफ प्रदर्शन नहीं किया. लेकिन मुझे कई बार दंगों का डर दिखाया गया. मुझे डराकर इस देश से बाहर भेजने की कोशिशें हुईं.

मैं सीधे-सीधे ये कहना चाहती हूं कि मैं दोषी नहीं हूं. मैं ये भी कह चुकी हूं कि मैंने कभी भी किसी की भावनाओं को चोट पहुंचाने के लिए नहीं लिखा. मैंने क्या गलत किया है? मैं हर किसी को, चाहे वो हिंदू हो या मुसलमान या बौद्ध या ईसाई, एक इंसान की तरह देखती हूं. क्या ऐसा करना गलत है? मैं चाहती हूं कि सबके साथ समानता का व्यवहार हो. मैं लगातार मानवता और मानवाधिकारों के समर्थन में लिखती रही हूं. कुछ कट्टरपंथी, रुढ़वादी और संकीर्ण विचारों वाले लोग मुझे बुरा साबित करने पर तुले हैं. लेकिन उनका ऐसा करना मुझे कभी भी इंसानों और इंसानियत के बारे में लिखने से नहीं रोक पाया. उन इंसानों के बारे में जो गरीब हैं और शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित हैं. जिनके अधिकारों पर सिर्फ इसलिए चोट की जाती है क्योंकि वे एक भिन्न आस्था में यकीन रखते हैं. मैं जिस तरह से बांग्लादेश के अल्पसंख्यक हिंदुओं के साथ हूं उसी तरह से भारत के मुसलमानों के भी साथ हूं. मुस्लिम हितों की आड़ में गंदी राजनीति करने वाले कट्टरपंथी, भारत के मुसलमानों के सच्चे प्रतिनिधि नहीं हैं.

क्या ये बताने का समय नहीं आ गया है कि कौन समाज के शत्रु हैं और कौन नहीं? क्या अब भी वक्त नहीं आया है कि इस अनचाही कैद से मुझे आज़ादी मिले? क्या इंसानियत या विचारों की आज़ादी के लिए लिखकर मैंने गलती की है? भारत सरकार मुझे किस जुर्म की सज़ा दे रही है? क्या भारत के लोग इस बात को देखेंगे कि मैं कैसे दर्द, कैसी निराशा और कैसे खालीपन के साथ जी रही हूं? कैसे लोगों की नज़रों से दूर मैं इस अंधेरे में मर रही हूं? कैसे मैं एक देश, घर, दोस्त और समाज के बिना जीने को अभिशप्त हूं? मैंने ऐसा कौन सा गुनाह किया था जो इस धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र में मुझे ये सज़ा मिल रही है?

मेरा राजनीति से कोई लेना-देना नहीं रहा. मैं प्रार्थना करती हूं कि लेखकों पर राजनीति होना बंद हो. एक लेखक को सोचने और लिखने के लिए अनुकूल माहौल मिले, वो बिना किसी डर के लिख सकें. यही मेरी विनम्र प्रार्थना है. मैं बस यही इस देश से मांगना चाहती हूं. हज़ारों सालों से भारत उन सभी लोगों को गले लगाता रहा है जिन्होंने यहां शरण मांगी. मुझे भी इस महान परंपरा पर गर्व है. कुछ ऐसा कीजिये कि इस लेखिका का ये गर्व सारी ज़िंदगी बना रहे.

तसलीमा नसरीन
साभार : तहलका हिन्दी

3 Responses to “आखिर मेरा कसूर ही क्या है?”

  1. Cyril Gupta Says:

    परिसर, आप बहुत अच्छे लेख ला रहे हैं. हम चाहते हैं कि आपके लेख और बहुतों तक पहुंचाने में कुछ योगदान करें, लेकिन आप हिन्दी और अंग्रेजी लेख एक ही जगह डाल रहे हैं, जिसकी वजह से हम इन्हें ब्लागवाणी पर नहीं ला पा रहे. अगर आप हिन्दी लेखों का एक अलग ब्लाग बनायें तो उसे हम ब्लागवाणी पर जोड़ेंगे, और कई नये पाठक आप तक आयेंगे.
    अगर आप ऐसा कर पायें तो मुझे ई-मेल करें.

  2. विकास बहुगुणा Says:

    परिसर जी,
    अगर लेख के साथ स्रोत के रूप में http://www.tehelkahindi.com का उल्लेख करेंगे तो अच्छा लगेगा.

  3. parisar Says:

    विकास जी याद दिलाने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद हम तहलका का जिक्र करना भूल गए थे

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