संस्कृति तथा स्वास्थ्य का खतरनाक खेल
वंदना शिवा
मनुष्यत्व के विकास से लेकर अब तक खाद्यान्न प्रजाति के 80000 से अधिक पौधों का स्वाद हमने चखा है. इनमें से तीन हज़ार से ज्यादा मनुष्य के लगातार इस्तेमाल में आ रहे हैं. बहरहाल, अब हम विश्व की खाद्य जरुरतों को पूरा करने के लिए सिर्फ आठ फसलों पर निर्भर हैं जो कि इस जरुरत का 75 प्रतिशत पूरा करती हैं. लेकिन अब अनुवांशिक अभियांत्रिकी ने उत्पादन को तीन फसलों – सोया, मक्का और राई के बीच समेट दिया है.
मोनोकल्चर हमारी जैव विविधता, हमारे स्वास्थ्य और खाद्यान्न की गुणवत्ता और बहुविविधता को नष्ट कर रहे हैं. मोनोकल्चर को औद्योगिक निर्वासन और कृषि के वैश्वीकरण के जरूरी घटक के जैसा देखा जाता रहा है. उन्हें ज्यादा खाद्यान्न पैदा करने वाला समझा जाता है. हालांकि वे सिर्फ मोनसांटो, कारगिल और ए.डी.एम के लिए ज्यादा प्रभुत्व और मुनाफा कमाने वाले साबित हो रहे हैं. वे जैव विविधता, स्थानीय खाद्यान्न प्रणाली और खाद्यान्न संस्कृति को खत्म करके फर्जी आधिक्य और असल अभाव पैदा कर रहे हैं.
सरसों, नारियल, मूंगफली, तिल, अलसी आदि से बनाए जाने वाले भारतीय देसी खाद्य तेल जिनका प्रसंस्करण विशिष्ट मिलों में किया जाता था, उन्हें “खाद्यान्न सुरक्षा” के बहाने प्रतिबंधित कर दिया गया.
इसके साथ ही साथ सोया तेल पर लगे हुए आयात प्रतिबंध को हटा लिया गया. इसने एक करोड़ किसानों की आजीविका पर संकट पैदा कर दिया. गाँवों में दस लाख तेल मिलें बंद हो गईं. भारतीय बाजारों को सोया सो पाट दिए जाने के कारण स्थानीय खाद्यान्न तेल के दामों में गिरावट आ रही थी. इसके विरोध प्रदर्शन के दौरान बीस से ज्यादा किसानों की जाने गईं. कई लाख टन कृत्रिम रुप से सस्ता जीएमओ सोया तेल भारतीय बाजार में उतार दिया गया. ……. Read the rest of this entry »




पक्षपात, डॉक्टरों की डंडी मारती रिपोर्ट. इस बात की सम्भावना काफ़ी थी कि २३ साल की बिलकिस को इस धर्मनिरपेक्ष संविधान वाले देश में इन्साफ मिले ही न. गोधरा के गुस्से में आपा खोना स्वाभाविक सी बात है, ऐसा कुछ तो भाजपा के भारत रत्न अटल बिहारी ने भी संसद में बुदबुदाया था. बिलकीस बानो की किस्मत एक तरफ़ ये सब देखने को मजबूर थी, जो एक आज़ाद हिंदुस्तान और गाँधी की जमीन में एक गर्भवती औरत को कभी नहीं देखना चाहिए था. तारे जमीन पर देखकर दो टसुये बहा कर बाल्टी भर पब्लिसिटी बटोरने वाले अडवानी और उनके पूरे परिवार ने कभी बिलकीस के बारे शायद ही सोचा हो. अगर नरेन्द्र मोदी का फिर मुख्य मंत्री बनना गुजरात का फ़ैसला है तो बिलकीस बनो केस दरअसल उस गुजरात पर फ़ैसला है जो नरेन्द्र मोदी चलाते हैं. राम के नाम पर चीर हरण हो रहा था. और दो महीने बाद ही माँ बनने वाली औरत मुस्लिम हो तो राम (या कृष्ण) क्यों उन्हें आकर बचायेंगे. बिलकीस बानो के साथ जो हुआ, उसमे जाहिर है मोदी का कोई रोल नहीं है. जिन बारह लोगो को इसका दोषी पाया गया उनमे गुजरात के गौरव का नाम नहीं है. साक्षात विकास पुरूष ने थोड़े ही कहा ये बिलकीस बानो है, सात माह से है इसके परिवार को ख़त्म करो, इसकी इज्ज़त लूटो. पुलिस तुम्हारे ख़िलाफ़ कुछ नहीं करेगी. मोदी ने डॉक्टरों से भी नहीं कहा कि बिलकीस बानो की रिपोर्ट सही मत लिखो. गुजरात सरकार के ये कारिंदे पता नहीं किसके इशारे पर ये ड्यूटी बजा रहे थे. और जब गलती नहीं की तो अफ़सोस किस बात का जाहिर करें. मोदी तो बच्चों कि तरह मासूम हैं और लोग देखिये गोधरा के बाद इतने गुस्सा हैं कि वह कहीं तो निकलता ही. भले ही इन लोगों को चुनाव का टिकेट मिला, उन्होंने मोदी को वोट दिया और ख़ुद को सच्चे रामभक्तों कि तरह प्रतिष्ठित किया. हालांकि वे लोग भगवा बनने का दावा करते थे, पर कानूनन मोदी न तो इस घटना के लिए जिम्मेदार हैं और न ही भागीदार. और फिर इस सबके बाद भी देखिये पूरा राज्य चाहता है कि मोदी उनके मुख्यमंत्री रहें. इन लोगों के एयरटेल और हच फ़ोन में रिंग टोन संस्कृत मंत्रों की थी जिसमे प्रचोदायत टाइप के शब्द सुनाई पड़ते हैं. मोदी उनके मुख्य मंत्री हैं और जनहित में अब कोई उनके ख़िलाफ़ कुछ भी बोला जाना गुजरात के ख़िलाफ़ बोला जाना है. इसलिए उसके साथ जो भी हुआ, उसके लिए मोदी के पास न तो कोई शब्द हैं, न तो प्रकट तौर पर कोई भाव. हादसे के छः साल बाद जब शुक्रवार को ये फ़ैसला आया, तो बिलकीस बानो के बचे खुचे घरवाले और रिश्तेदार (करीब साठ लोग) अपने घरों में ताला लगाकर रान्धिकपुर से भाग खड़े हुए कि कहीं फैसले के बाद फिर कोई फजीता न खड़ा हो जाए. ये डर भी मोदी ने थोडी ही पैदा किया है. बिलकीस बानो इस वक्त और गुजरात का सच है. जैसे ये सच है कि नरेन्द्र मोदी को लोग चुन रहे हैं. बड़ी बात ये है कि सारी मुश्किलों के बाद भी बिलकीस ने इन्साफ कि आस न छोड़ी और भले ही जनता की अदालत ने मोदी के पक्ष में फ़ैसला देकर उसकी लाज, उसका स्त्रीत्व, उसके साठ हुए जुल्म और जुर्म, दोनों को छोटा कर दिया हो, कानून की अदालत में ऐसा नहीं हुआ. ये भी सोचने की बात है कि अगर यही मामला गुजरात कि अदालतों में सुना जाता तो क्या तब भी उसका हश्र यही होता. मुम्बई में जब गुरुवार को ये फ़ैसला सुनाया गया, उसके तीन दिन बाद ही यानी कल रविवार को दादर में मोदी की रैली होने वाली है. मैराथन और मुहर्रम के दिन. मुम्बई में भाजपा के लोग और उनके गुजराती समर्थक मोदी की मर्दानगी की वाह वाही करेंगे. मोदी के मुंह से फिर छः करोड़ गुजराती निकलेगा जिसमे बिलकीस बानो शामिल नहीं होगी.