ज़िन्दा लोग
Posted by parisar on October 26, 2007
नरेश सक्सेना
ज़िन्दा लोग ज्यादा देर इन्तज़ार नहीं करते
इन्तज़ार तो लाशें भी नहीं करती
एक दिन
हद से हद दो
बस
उसके बाद तो वे हवा में उड़ने लगती हैं
पीछा करती घेरती सीने पर हो जाती हैं सवार
वसूल कर लेती हैं
अपने सब जायज़ नाजायज़ हकों को
लाशों को हम से ज़्यादा हवा चाहिए
उन्हें हम से ज़्यादा पानी चाहिए
उन्हें हम से ज़्यादा बर्फ चाहिए
उन्हें हम से ज़्यादा आग चाहिए
उन्हें चाहिए इतिहास मे हम से ज़्यादा जगह
इससे पहले कि वे घेर लें सारी जगह
मैं कहता हूँ कि
इन्तज़ार करती होंगी नदिया बारिश का वर्ष भर
बसन्त का इन्तज़ार करते होंगे वृक्ष
लेकिन लोग
जिंदा लोग ज़्यादा देर इन्तज़ार नहीं करते
मुश्किलें मुसीबतें और मौत तो आती ही हैं
इससे पहले की कोई संकट उन्हें चुने
वे चुन लेते हैं
अपना मनचाहा संकट
वे चुन लेते हैं अपने मरने की सही जगह और वक़्त
बार बार नही मरते जिंदा लोग
ज्यादा देर इंतजार नहीं करते




December 7, 2007 at 2:40 am
good poem
February 24, 2008 at 8:18 pm
achchhi kavita hai.