नरेश सक्सेना
ज़िन्दा लोग ज्यादा देर इन्तज़ार नहीं करते
इन्तज़ार तो लाशें भी नहीं करती
एक दिन
हद से हद दो
बस
उसके बाद तो वे हवा में उड़ने लगती हैं
पीछा करती घेरती सीने पर हो जाती हैं सवार
वसूल कर लेती हैं
अपने सब जायज़ नाजायज़ हकों को
लाशों को हम से ज़्यादा हवा चाहिए
उन्हें हम से ज़्यादा पानी चाहिए
उन्हें हम से ज़्यादा बर्फ चाहिए
उन्हें हम से ज़्यादा आग चाहिए
उन्हें चाहिए इतिहास मे हम से ज़्यादा जगह
इससे पहले कि वे घेर लें सारी जगह
मैं कहता हूँ कि
इन्तज़ार करती होंगी नदिया बारिश का वर्ष भर
बसन्त का इन्तज़ार करते होंगे वृक्ष
लेकिन लोग
जिंदा लोग ज़्यादा देर इन्तज़ार नहीं करते
मुश्किलें मुसीबतें और मौत तो आती ही हैं
इससे पहले की कोई संकट उन्हें चुने
वे चुन लेते हैं
अपना मनचाहा संकट
वे चुन लेते हैं अपने मरने की सही जगह और वक़्त
बार बार नही मरते जिंदा लोग
ज्यादा देर इंतजार नहीं करते



